
एक ऐसा मामला… जो झारखंड की न्यायिक और सुरक्षा व्यवस्था दोनों की बुनियाद को हिला रहा है। एक ऐसा फैसला… जिसने देश की कानूनी प्रणाली के सामने सवालों की बाढ़ ला दी है। और दो जज… जो एक ही केस पर अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंचे। साल 2013 में हुए एसपी अमरजीत बलिहार हत्याकांड में दो नक्सलियों को मिली फांसी की सजा अब कानूनी ऊहापोह में फंस गई है। झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ में बैठे दो न्यायमूर्तियों की राय अलग-अलग रही — एक ने सजा बरकरार रखी, दूसरे ने आरोपियों को बरी कर दिया। अब फैसला कौन करेगा? क्या इंसाफ लटक गया है या नया रास्ता निकलेगा?
साल 2013, झारखंड का पाकुड़ जिला। एक भयावह दिन जब नक्सलियों ने काफिले पर हमला कर तत्कालीन एसपी अमरजीत बलिहार और उनके पांच साथी पुलिसकर्मियों की जान ले ली। इस जघन्य हमले में दो नक्सलियों – सुखलाल मुर्मू और सनातन बास्की – को गिरफ्तार किया गया और निचली अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। ये फैसला न केवल पीड़ित परिवारों के लिए एक सुकून था, बल्कि यह भी संकेत था कि कानून व्यवस्था अब जवाब देने लगी है। लेकिन इन दोनों दोषियों ने फैसले को रांची हाईकोर्ट में चुनौती दी – और यहीं से मामला जटिल हो गया।
इस केस की सुनवाई जस्टिस रंजन मुखोपाध्याय और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने की। सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला तीन फरवरी 2022 को सुरक्षित रखा गया था। जब फैसला आया, तो वह चौंकाने वाला था। जस्टिस मुखोपाध्याय ने दोनों नक्सलियों को बरी कर दिया और कहा कि फांसी की सजा को सही ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। दूसरी ओर, जस्टिस संजय प्रसाद ने इस फैसले से पूरी तरह असहमति जताई और कहा कि यह हमला कानून और शासन व्यवस्था पर सीधा हमला था — इसलिए फांसी की सजा ही उचित है। दो जज, दो निष्कर्ष — अब कानूनी प्रक्रिया ठहर गई है।
अब चूंकि दोनों न्यायाधीशों के फैसले विपरीत हैं, झारखंड हाईकोर्ट को एक नई बेंच गठित करनी होगी। वही नई बेंच अब तय करेगी कि सुखलाल मुर्मू और सनातन बास्की को फांसी दी जाएगी या नहीं। यह सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की न्यायिक और सुरक्षात्मक संरचना की परीक्षा भी है। राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह हमला सिर्फ एक पुलिस अधिकारी पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढांचे पर सीधा हमला था, और दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी ही चाहिए। क्या नई बेंच इस तर्क से सहमत होगी? यह देखना बेहद अहम होगा।
