
Karma Puja 2025: झारखंड की लोक संस्कृति में करमा पर्व का विशेष स्थान है। यह पर्व भादो मास की एकादशी को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। करमा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन और सामूहिक एकजुटता का प्रतीक है। इसमें किसी मूर्ति या भव्य मंदिर की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि प्रकृति ही इसका देवता मानी जाती है। करम डाली, मिट्टी, बीज, पानी और सूर्य की किरणें ही इस पूजा का आधार हैं। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं और प्रकृति की सुरक्षा ही जीवन की सुरक्षा है।
करमा पर्व की परंपरा कृषि और खेती से गहराई से जुड़ी हुई है। सात या नौ दिन पहले करमइतिन महिलाएं बांस की डाली में गेहूं, जौ, चना, धान और अन्य बीज बोती हैं। इसे “जावा” कहा जाता है और हर दिन इसे पानी से सींचा जाता है। जब बीज अंकुरित होकर पीले-हरे जावा फूल में बदलते हैं तो पूरे गांव में उत्सव का माहौल बन जाता है। करमा पूजा के दिन करम डाली जंगल से लाई जाती है और ढोल-मांदर की थाप पर गीत-नृत्य के साथ अखरा में स्थापित की जाती है। रात को उपवास की हुई महिलाएं पूजा करती हैं और भाई-बहन के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाने के लिए ‘केकर करम, केकर धरम?’ जैसे संवाद गूंजते हैं।
इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता भाई-बहन के अटूट रिश्ते से जुड़ी है। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और घर की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। नवविवाहिताओं को मायके की याद सताती है और भाई अपनी बहनों को सम्मानपूर्वक लियाने जाते हैं। करमा गीतों में इस भाव को मार्मिक ढंग से व्यक्त किया जाता है। वहीं, विवाहित महिलाएं संतान सुख की मनौती करती हैं और अविवाहित युवतियां स्नेही भाई की कामना करती हैं। करमा गीत और नृत्य इस पर्व को और भी जीवंत बनाते हैं, जिनमें प्रकृति की सुंदरता और मानवीय भावनाओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
आज भले ही डीजे और आधुनिक साधन करमा पूजा का हिस्सा बन गए हों, लेकिन इसकी असली आत्मा लोकगीतों, ढोल-मांदर की थाप और सामूहिक नृत्य में ही बसती है। करमा पर्व हमें हमारी जड़ों, हमारी भाषा और हमारी संस्कृति से जोड़ता है। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि भाई-बहन के प्रेम, माता-पिता की सेवा, संतान-सुख की आशा और समाज की एकजुटता का उत्सव है। यही कारण है कि करमा को झारखंड की आत्मा कहा जाता है, जो हर साल हमें प्रकृति और रिश्तों के महत्व की याद दिलाता है।
Writer: देवेन्द्र कुमार नयन
सिविल इंजीनियर | लेखक
देवघर, झारखंड
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