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Abdul Qayyum Ansari Birth Anniversary: बाबा-ए-कौम अब्दुल कय्यूम अंसारी की 121वीं जयंती—जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत के प्रखर विरोधी और सामाजिक न्याय के मजबूत पैरोकार

zabazshoaib

Abdul Qayyum Ansari Birth Anniversary: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे नेता हुए, जिनके योगदान को समय के साथ अपेक्षित पहचान नहीं मिल सकी। ऐसे ही महान राष्ट्रवादी, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और पसमांदा समाज के अग्रणी नेता थे बाबा-ए-कौम, फख्र-ए-कौम अब्दुल कय्यूम अंसारी। आज उनकी 121वीं जयंती पर देश उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। उनका जीवन केवल आज़ादी की लड़ाई तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा, राष्ट्रीय एकता और वंचित समाज के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष की मिसाल भी था।

गाजीपुर से बिहार तक का सफर

अब्दुल कय्यूम अंसारी का जन्म 1 जुलाई 1905 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के नवली गांव में हुआ। बाद में उनका परिवार बिहार के डेहरी-ऑन-सोन में आकर बस गया। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने अलीगढ़ और फिर कोलकाता में उच्च शिक्षा प्राप्त की। छात्र जीवन के दौरान ही वे राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक चेतना से गहराई से प्रभावित हुए।

किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े

महज 16 वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। सासाराम में अली बंधुओं के संपर्क में आने के बाद वे खिलाफत आंदोलन से जुड़े और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय रहे। आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उनके लिए देश की आज़ादी किसी भी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थी।

जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत का मुखर विरोध

1930 और 1940 के दशक में जब मुस्लिम लीग अलग राष्ट्र की मांग को तेज़ कर रही थी, तब अब्दुल कय्यूम अंसारी उन प्रमुख मुस्लिम नेताओं में शामिल थे जिन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत का स्पष्ट और सार्वजनिक विरोध किया। उनका मानना था कि भारत की पहचान उसकी साझी विरासत, सांस्कृतिक विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों में है, न कि धर्म के आधार पर विभाजन में।

उन्होंने लगातार यह तर्क रखा कि भारत के आम मुसलमानों, विशेषकर कारीगरों, बुनकरों और पिछड़े वर्गों की वास्तविक समस्याएं शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक समानता से जुड़ी हैं, न कि अलग राष्ट्र की मांग से।

मोमिन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सामाजिक चेतना

अब्दुल कय्यूम अंसारी ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस के प्रमुख नेताओं में रहे। यह संगठन बुनकर (मोमिन/अंसारी) तथा अन्य सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित मुस्लिम समुदायों के अधिकारों, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी के लिए कार्य करता था। मोमिन कॉन्फ्रेंस ने मुस्लिम लीग की राजनीति और द्विराष्ट्र सिद्धांत का वैचारिक विरोध किया तथा संयुक्त भारत के पक्ष में जनमत तैयार करने का प्रयास किया। वे बिहार राज्य जमायत-उल-मोमिनीन के अध्यक्ष भी रहे। उनके नेतृत्व में संगठन ने शिक्षा, सामाजिक सुधार और पिछड़े मुस्लिम समुदायों के संगठनात्मक सशक्तीकरण पर विशेष बल दिया।

सामाजिक न्याय और पसमांदा समाज की आवाज़

अब्दुल कय्यूम अंसारी का मानना था कि सामाजिक न्याय का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने बुनकरों, दस्तकारों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की समस्याओं को लगातार उठाया। आज जिस “पसमांदा” विमर्श की व्यापक चर्चा होती है, उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने वाले प्रमुख नेताओं में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

उनकी सोच स्पष्ट थी कि सामाजिक और आर्थिक बराबरी के बिना लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। वे धार्मिक पहचान से अधिक सामाजिक न्याय और समान अवसर को महत्व देते थे।

शिक्षा को बनाया परिवर्तन का माध्यम

अब्दुल कय्यूम अंसारी का विश्वास था कि शिक्षा ही समाज में स्थायी परिवर्तन ला सकती है। उन्होंने गरीब और जरूरतमंद छात्रों के लिए छात्रावास तथा शैक्षणिक सुविधाओं के विस्तार का समर्थन किया। वे चाहते थे कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी शिक्षा प्राप्त कर समाज की मुख्यधारा में आगे बढ़ें।

पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक सुधार

राजनीति के साथ-साथ वे एक प्रभावशाली पत्रकार, लेखक और चिंतक भी थे। उन्होंने उर्दू साप्ताहिक ‘अल-इस्लाह’ और मासिक ‘मुसावात’ का संपादन किया। उनकी लेखनी सामाजिक सुधार, समानता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता के पक्ष में थी। उन्होंने पत्रकारिता को समाज में जागरूकता फैलाने का प्रभावी माध्यम बनाया।

Abdul Qayyum Ansari: स्वतंत्र भारत में जनसेवा

स्वतंत्रता के बाद अब्दुल कय्यूम अंसारी ने बिहार सरकार में कई बार कैबिनेट मंत्री के रूप में जिम्मेदारियां निभाईं। वे बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष, कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और राज्यसभा सदस्य भी रहे। सार्वजनिक जीवन में उनकी पहचान एक ऐसे जननेता की रही, जो सत्ता से अधिक समाज के कमजोर और वंचित वर्गों की आवाज़ बनने के लिए जाने जाते थे।

आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार

आज, जब सामाजिक न्याय, समान प्रतिनिधित्व और समावेशी विकास की चर्चा होती है, तब अब्दुल कय्यूम अंसारी के विचार पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने पूरे जीवन से यह संदेश दिया कि एक मजबूत भारत का निर्माण तभी संभव है, जब हर नागरिक को समान सम्मान, शिक्षा, अवसर और न्याय मिले।

Abdul Qayyum Ansari Birth Anniversary: 121वीं जयंती पर देश ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रवादी चिंतक और सामाजिक न्याय के अग्रदूत को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।