ASI Survey in Jharkhand : हजारीबाग के चौपारण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम ने हथिंदर, सोहरा और दैहर समेत कई पुरास्थलों का किया विस्तृत सर्वे। महापाषाणिक संस्कृति, लौह उद्योग, सती स्टोन, बौद्ध एवं सनातन प्रतिमाओं और असुर जनजाति की लौह तकनीक से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाण मिले।
ASI Survey in Jharkhand : ASI Survey in Jharkhand: हजारीबाग के चौपारण में 3500 वर्ष पुरानी सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। हथिंदर और सोहरा पहली बार ASI रिकॉर्ड में दर्ज हुए। सर्वे में सती स्टोन, असुर जनजाति की लौह तकनीक, महापाषाणिक अवशेष और दुर्लभ प्रतिमाएं सामने आई हैं।

ASI Survey in Jharkhand : झारखंड के हजारीबाग जिले का चौपारण क्षेत्र अब देश के महत्वपूर्ण पुरातात्विक केंद्रों में अपनी अलग पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रांची जोन की टीम द्वारा किए गए दो दिवसीय विस्तृत सर्वेक्षण में हथिंदर, सोहरा और दैहर समेत कई ऐतिहासिक स्थलों का औपचारिक दस्तावेजीकरण किया गया। इस सर्वेक्षण के बाद हथिंदर और सोहरा के पुरातात्विक अवशेष पहली बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आधिकारिक अभिलेखों में दर्ज हो गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चौपारण, हजारीबाग और चतरा क्षेत्र अपने भीतर लगभग तीन से साढ़े तीन हजार वर्ष पुरानी सभ्यता के महत्वपूर्ण प्रमाण संजोए हुए हैं। यदि भविष्य में व्यापक वैज्ञानिक शोध किया गया तो यह क्षेत्र पूर्वी भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल हो सकता है।
ASI टीम ने किया विस्तृत वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने सहायक पुरातत्वविद डॉ. नीरज कुमार मिश्रा और वरिष्ठ छायाकार कन्हैया कुमार झा के नेतृत्व में क्षेत्र का गहन निरीक्षण किया। सर्वेक्षण के दौरान प्राचीन मूर्तियों, अभिलेखों, आयरन स्लैग, महापाषाणिक अवशेषों, मृदभांडों और धार्मिक स्थलों का तकनीकी अध्ययन किया गया।
टीम ने सभी पुरावशेषों की फोटोग्राफी, माप, भौगोलिक स्थिति और तकनीकी रिकॉर्ड तैयार किया है। यह रिपोर्ट अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वरीय अधिकारियों को भेजी जाएगी। चौपारण क्षेत्र में यह ASI का तीसरा आधिकारिक सर्वेक्षण है। इससे पहले मानगढ़, चैथी और दैहर का भी सर्वेक्षण किया जा चुका है।
जुलाई के अंत में होगा पांच दिवसीय वैज्ञानिक सर्वे
डॉ. नीरज मिश्रा ने बताया कि जुलाई के अंतिम सप्ताह में पांच दिनों का एक विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण प्रस्तावित है। इस दौरान कई नए पुरास्थलों का अध्ययन किया जाएगा और अब तक मिले पुरातात्विक साक्ष्यों का गहन विश्लेषण किया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार हजारीबाग और चतरा जिले में लगातार मिल रहे साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि यहां प्राचीन काल में विकसित सामाजिक, धार्मिक और तकनीकी संस्कृति मौजूद थी।

असुर जनजाति की लौह तकनीक ने बढ़ाया महत्व
सर्वेक्षण के दौरान सबसे महत्वपूर्ण खोजों में बड़ी मात्रा में मिले आयरन स्लैग (Iron Slag), लौह भट्टियों के अवशेष और लौह उत्पादन से जुड़ी सामग्री शामिल रही।
डॉ. मिश्रा के अनुसार चौपारण और चतरा क्षेत्र में पहली शताब्दी ईस्वी से ही असुर जनजाति द्वारा लौह प्रगलन (Iron Smelting) किए जाने के पर्याप्त प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
महापाषाणिक समाधि स्थलों के आसपास मिले लौह स्लैग, भट्टियों के अवशेष और लौह अयस्क के टुकड़े यह दर्शाते हैं कि यहां अत्यंत विकसित लौह उद्योग मौजूद था। यह तकनीक केवल प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक सीमित नहीं रही बल्कि आठवीं और नौवीं शताब्दी तक निरंतर विकसित होती रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही उन्नत धातुकर्म तकनीक आगे चलकर मंदिरों, मठों और विशाल स्थापत्य निर्माण में उपयोगी सिद्ध हुई।
मानगढ़ से मिले ताम्र पाषाण काल के प्रमाण
ASI टीम ने बताया कि मानगढ़ क्षेत्र से ताम्र पाषाण काल (Chalcolithic Age) के महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य पहले ही प्राप्त हो चुके हैं। वहीं हथिंदर, दैहर और आसपास के क्षेत्रों में मिले लौह उत्पादन के प्रमाण यह स्पष्ट करते हैं कि चौपारण केवल धार्मिक गतिविधियों का केंद्र नहीं था बल्कि यहां उन्नत धातुकर्म और तकनीकी विकास भी हुआ था।
इससे यह भी संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र प्राचीन व्यापार और उत्पादन गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा।
हथिंदर का सती स्टोन बना शोध का नया विषय
सर्वेक्षण के दौरान हथिंदर गांव में स्थित प्राचीन सती प्रस्तर स्तंभ (Sati Stone) का भी विस्तृत अध्ययन किया गया।
इस प्रस्तर पर सूर्य, चंद्रमा, आशीर्वाद की मुद्रा में उठा हुआ हाथ तथा महिला और पुरुष की आकृतियां उकेरी गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये आकृतियां उस समय की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं।
डॉ. मिश्रा ने बताया कि झारखंड में इस प्रकार के सती स्मारकों के प्रमाण अब तक केवल हथिंदर, पलामू के देवगन तथा चतरा के भद्रकाली मंदिर परिसर से ही मिले हैं।
शैलीगत अध्ययन के आधार पर इन सती प्रस्तरों का काल लगभग 14वीं से 15वीं शताब्दी ईस्वी माना जा रहा है।
दैहर में मिलीं दुर्लभ प्रतिमाएं
सर्वेक्षण के दौरान दैहर गांव एक बार फिर विशेषज्ञों के आकर्षण का केंद्र बना।
यहां नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच की कई दुर्लभ प्रस्तर प्रतिमाएं संरक्षित मिली हैं। इनमें उमा-महेश्वर, विष्णु, शिव सहित शैव और वैष्णव परंपरा की उत्कृष्ट मूर्तियां शामिल हैं।
इसके अलावा अवलोकितेश्वर, देवी तारा, बोधिसत्त्व और भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म की मजबूत उपस्थिति का प्रमाण देती हैं।
कई प्रस्तर फलक पर मन्नत स्तूप तथा बुद्ध प्रतिमाओं का अंकन भी मिला है। छोटे-छोटे स्तूपों के अवशेष यह संकेत देते हैं कि यहां कभी बौद्ध भक्ति परंपरा का व्यापक विकास हुआ था।
कमला माता मंदिर परिसर में सुरक्षित बौद्ध देवी मरीची की दुर्लभ प्रतिमा भी विशेषज्ञों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रही। इस प्रतिमा पर अंकित अभिलेख इसके ऐतिहासिक महत्व को और अधिक मजबूत बनाते हैं।
मृदभांडों ने खोले प्राचीन इतिहास के नए अध्याय
सर्वेक्षण के दौरान क्षेत्र से प्राप्त ब्लैक एंड रेड वेयर (Black and Red Ware) तथा नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) मृदभांडों का भी अध्ययन किया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन मृदभांडों की उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि चौपारण क्षेत्र प्रागैतिहासिक काल से लेकर प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक लगातार आबाद रहा और यहां विकसित सभ्यता का विस्तार था।
यह खोज इस क्षेत्र के प्राचीन मानव बसाव, व्यापारिक गतिविधियों और सांस्कृतिक विकास के अध्ययन में नई दिशा प्रदान कर सकती है।
संग्रहालय की आवश्यकता हुई महसूस
विशेषज्ञों ने दैहर और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षित दुर्लभ प्रतिमाओं एवं अन्य पुरावशेषों के संरक्षण के लिए स्थानीय संग्रहालय की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उनका मानना है कि यदि इन अमूल्य धरोहरों का वैज्ञानिक संरक्षण किया जाए तो यह क्षेत्र न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पर्यटन और शोध का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
भविष्य में मिल सकते हैं और बड़े साक्ष्य
डॉ. नीरज मिश्रा ने कहा कि हजारीबाग और चतरा की धरती में समृद्ध इतिहास छिपा हुआ है। आयरन स्लैग, महापाषाणिक अवशेष, प्राचीन मृदभांड, बौद्ध और सनातन परंपरा की दुर्लभ प्रतिमाएं इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की पुष्टि करती हैं।
उन्होंने बताया कि सभी पुरास्थलों का विस्तृत दस्तावेज तैयार कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा जाएगा। भविष्य में व्यापक वैज्ञानिक अनुसंधान से झारखंड के इतिहास से जुड़े कई नए तथ्य सामने आने की पूरी संभावना है।
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