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Barter WATER Mission : बार्टरवाटर मॉडल से जल संरक्षण को नई दिशा, रेनबो क्रेडिट के जरिए स्वच्छ पानी और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ेंगे ग्रामीण

Megha Sinha

Barter WATER Mission : भारत के ग्रामीण इलाकों में जल संरक्षण को केवल जागरूकता अभियान तक सीमित रखने के बजाय उसे सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में BarterWATER पहल काम कर रही है। बिहार के आरा से शुरू हुए इस प्रयोग में स्वच्छ पेयजल, आर्सेनिक शोधन, ग्रे-वॉटर प्रबंधन, कचरा पृथक्करण, बांस आधारित उत्पाद और डिजिटल जल प्रबंधन तकनीक को एक साथ जोड़ा जा रहा है। अब इस मॉडल को झारखंड, असम और आगे वैश्विक स्तर तक ले जाने की तैयारी है।

Barter WATER Mission : देश के ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट, गिरता भूजल स्तर, भूजल प्रदूषण और जल संसाधनों के असमान उपयोग जैसी चुनौतियां लगातार गंभीर होती जा रही हैं। ऐसे समय में पानी को केवल उपभोग की वस्तु न मानकर समुदाय, प्रकृति और स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र में रखने की कोशिश की जा रही है।

इसी सोच के साथ WHEELS Global Foundation, WIN Foundation और WaterBANK Foundation की साझेदारी से BarterWATER पहल शुरू की गई है। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के साथ जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ जोड़ना है।

इस मॉडल की खासियत यह है कि लोगों को केवल पानी बचाने के लिए जागरूक करने के बजाय उनके पर्यावरण-अनुकूल व्यवहार को एक प्रोत्साहन व्यवस्था से जोड़ा जाता है। इसके लिए ‘रेनबो क्रेडिट’ की अवधारणा विकसित की गई है।

BarterWATER मॉडल में ग्रामीण परिवार पानी बचाने और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों के जरिए रेनबो क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं। इनमें पानी की बचत, ग्रे-वॉटर का बेहतर प्रबंधन, कचरे का पृथक्करण और अन्य प्रकृति-अनुकूल गतिविधियां शामिल हैं।

अर्जित किए गए इन क्रेडिट का इस्तेमाल स्वच्छ पेयजल, प्रकृति आधारित उत्पादों और स्थानीय सेवाओं के लिए किया जा सकता है। यानी पर्यावरण संरक्षण को सीधे सामुदायिक लाभ से जोड़ने का प्रयास किया गया है।

उदाहरण के तौर पर नेट-जीरो ग्रे-वॉटर डिस्चार्ज जैसी व्यवस्था अपनाने वाले परिवारों को 1,000 रेनबो क्रेडिट दिए जा सकते हैं। इन क्रेडिट का उपयोग स्वच्छ पानी अथवा बांस से बने उत्पाद प्राप्त करने में किया जा सकता है। इस तरह जल संरक्षण, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और स्थानीय उत्पादों के बीच एक सामुदायिक आर्थिक चक्र तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

BarterWATER मॉडल का पायलट चरण बिहार के आरा जिले के पकड़ी गांव से शुरू हुआ। 16 फरवरी 2025 को यहां पहला WaterBANK यूनिट स्थापित किया गया।

इस प्रयोग में तकनीक, सामुदायिक भागीदारी और प्रोत्साहन आधारित अर्थव्यवस्था को एक साथ लाने का प्रयास किया गया। मॉडल के पीछे सोच यह है कि यदि स्थानीय समुदाय को जल संरक्षण से प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, तो पानी बचाने और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े व्यवहार को लंबे समय तक बनाए रखना आसान हो सकता है।

यहां पानी को केवल एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि समुदाय और प्रकृति के बीच संबंध के महत्वपूर्ण केंद्र के तौर पर देखा जा रहा है।

BarterWATER पहल में आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों के लिए तकनीकी समाधान पर भी जोर दिया गया है। इसके तहत IIT खड़गपुर की विकसित OAS जल शुद्धिकरण तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

इस तकनीक में लेटराइट खनिज के माध्यम से पानी में मौजूद आर्सेनिक को बांधने और उसके सुरक्षित निपटान का प्रयास किया जाता है। भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में लंबे समय से सुरक्षित पेयजल के लिए चुनौती बनी हुई है।

ऐसे में स्थानीय स्तर पर लागू किए जा सकने वाले और अपेक्षाकृत कम लागत वाले जल शोधन समाधान ग्रामीण इलाकों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

BarterWATER पहल अब पारंपरिक जल संरक्षण से आगे बढ़कर डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित समाधानों की दिशा में भी काम कर रही है।

WaterBANK के अनुसार, उसकी पेटेंटेड AIoT for Water तकनीक को केंद्र में रखकर जल के कुशल उपयोग, विशेष रूप से जल-कुशल कृषि, और जल परिसंपत्तियों की मजबूती तथा भविष्यवाणी क्षमता बढ़ाने के लिए Digital Twin विकसित किया जा रहा है।

Digital Twin वास्तविक जल प्रणालियों का डिजिटल प्रतिरूप तैयार करने की अवधारणा है। इसके माध्यम से उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण कर जल संसाधनों की स्थिति समझने, संभावित बदलावों का अनुमान लगाने और भविष्य की जल प्रबंधन रणनीति तैयार करने में मदद मिल सकती है।

इससे WaterBANK मॉडल का दायरा केवल स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जल प्रबंधन, जल-कुशल कृषि और भविष्य की जल आवश्यकताओं की योजना तक विस्तार पा सकता है।

WaterBANK व्यवस्था को सौर ऊर्जा से संचालित करने की दिशा में Husk Power Systems जैसी संस्थाओं का सहयोग लिया गया है। वहीं IIT खड़गपुर की तकनीक के व्यावसायीकरण की दिशा में VAS Bros. Enterprises काम कर रहा है।

पहल को विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से भी समर्थन मिला है। WHEELS Global Foundation के अनुसार, UNIDO के Global Clean-Tech Innovation Program, UNICEF, भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और National Bamboo Mission सहित कई संस्थाएं अलग-अलग स्तरों पर इस पहल से जुड़ी हैं।

इसके प्रभाव का अध्ययन और आकलन करने के लिए National Institute of Advanced Studies यानी NIAS, बेंगलुरु से भी जुड़ाव किया गया है।

BarterWATER का प्रयोग अब बिहार तक सीमित नहीं है। पहल को झारखंड और असम के विभिन्न क्षेत्रों तक ले जाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

इन राज्यों की भौगोलिक, सामाजिक और जल संबंधी परिस्थितियां अलग-अलग हैं। ऐसे में मॉडल का विस्तार स्थानीय जरूरतों और संसाधनों के अनुरूप जल संरक्षण के नए रास्ते तलाशने का अवसर दे सकता है।

यदि समुदाय आधारित यह मॉडल प्रभावी साबित होता है, तो इसे अन्य जल संकटग्रस्त ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू करने की संभावनाएं बन सकती हैं।

WaterBANK के BarterWATER मिशन को भारत के ग्रामीण क्षेत्रों से आगे वैश्विक स्तर पर ले जाने की भी तैयारी है। 8 से 10 दिसंबर को अबू धाबी में प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्र जल सम्मेलन में इस मिशन की योजनाओं और अब तक के कार्यों को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने की योजना बताई गई है।

इसका उद्देश्य भारत में विकसित समुदाय-केंद्रित जल प्रबंधन मॉडल को अन्य जल संकटग्रस्त क्षेत्रों के सामने एक संभावित समाधान के रूप में प्रस्तुत करना है।

BarterWATER मॉडल की मूल अवधारणा यह है कि विकास का मतलब केवल सड़क, बिजली और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार नहीं होना चाहिए। पानी, प्रकृति, स्थानीय संसाधन और समुदाय भी विकास की योजना के केंद्र में होने चाहिए।

यदि कोई परिवार पानी बचाता है, ग्रे-वॉटर का बेहतर प्रबंधन करता है या कचरे को अलग-अलग करके पर्यावरण संरक्षण में योगदान देता है, तो उसके प्रयास का प्रत्यक्ष लाभ उसे मिल सके—रेनबो क्रेडिट इसी सोच को व्यवहार में लाने का प्रयास है।

बिहार से शुरू होकर झारखंड और असम तक पहुंच रही यह पहल अब रेनबो क्रेडिट, स्वच्छ पेयजल, आर्सेनिक शोधन, AIoT, Digital Twin, जल-कुशल कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे कई पहलुओं को एक साथ जोड़ रही है।

आने वाले समय में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह मॉडल अलग-अलग क्षेत्रों में कितनी प्रभावी ढंग से लागू होता है और समुदाय इसे कितनी मजबूती से अपनाता है। हालांकि, पानी बचाने वाले व्यवहार को आर्थिक मूल्य देने और तकनीक को स्थानीय जरूरतों से जोड़ने की अवधारणा ग्रामीण जल प्रबंधन में एक अलग दिशा जरूर प्रस्तुत करती है।