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Ranchi News : झारखंड में कार्बन मार्केट को बढ़ावा देने की तैयारी, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए रांची में हुई अहम कार्यशाला

Megha Sinha

Ranchi News : भूमि क्षरण, जल संरक्षण, कृषि वानिकी और ग्रामीण आजीविका को कार्बन वित्त से जोड़ने पर मंथन; किसानों एवं जनजातीय समुदायों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की संभावनाओं पर हुई चर्चा।

Ranchi News : झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने रांची में कार्बन मार्केट को लेकर हितधारक कार्यशाला आयोजित की। इसमें जलवायु अनुकूल कृषि, भूमि पुनर्स्थापन, कार्बन वित्त और ग्रामीण एवं जनजातीय समुदायों की आजीविका मजबूत करने पर चर्चा हुई।

Ranchi News : जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों के बीच झारखंड सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कार्बन मार्केट की संभावनाओं पर काम शुरू किया है। इसी कड़ी में झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की ओर से राजधानी रांची स्थित होटल चाणक्य बीएनआर में ‘Leveraging Carbon Market for a Climate Resilient Jharkhand’ विषय पर हितधारक कार्यशाला आयोजित की गई।

इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य झारखंड में कार्बन वित्त की संभावनाओं को समझना और उसके माध्यम से जलवायु अनुकूल कृषि, कृषि वानिकी, भूमि पुनर्स्थापन तथा ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के रास्ते तलाशना था। कार्यक्रम में सरकारी विभागों, वित्तीय संस्थानों, जलवायु विशेषज्ञों, विकास संगठनों और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

कार्यशाला में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि कार्बन मार्केट को केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित न रखकर इसे किसानों, ग्रामीण परिवारों और जनजातीय समुदायों की आर्थिक स्थिति सुधारने के माध्यम के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।

Ranchi News : झारखंड में कार्बन मार्केट को बढ़ावा देने की तैयारी, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए रांची में हुई अहम कार्यशाला 1

कार्यशाला को संबोधित करते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख संजीव कुमार ने कार्बन ट्रेडिंग को पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका संवर्धन का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि इस दिशा में प्रभावी परिणाम प्राप्त करने के लिए उद्योग, खनन, ऊर्जा और अन्य संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए झारखंड में लगभग 69 प्रतिशत भूमि क्षरण की चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित किया। यह आंकड़ा राज्य के प्राकृतिक संसाधनों और भूमि की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चर्चा की आवश्यकता को दर्शाता है।

संजीव कुमार ने जल संरक्षण, वृक्षारोपण, भूमि पुनर्स्थापन और बायोगैस जैसे उपायों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उनके अनुसार, इन गतिविधियों को योजनाबद्ध तरीके से लागू कर पर्यावरणीय लाभ के साथ स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के नए अवसर भी तैयार किए जा सकते हैं।

झारखंड जैसे राज्य में, जहां बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, वहां जलवायु अनुकूल विकास की रणनीति बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

कार्यशाला में पीपीसीएफ एवं चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन रवि रंजन ने कार्बन परियोजनाओं के विकास में सामुदायिक आजीविका को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि कार्बन मार्केट से संबंधित योजनाएं वैज्ञानिक और प्रमाण-आधारित आंकड़ों पर आधारित होनी चाहिए।

कार्बन परियोजनाओं का वास्तविक लाभ तभी सुनिश्चित हो सकेगा, जब स्थानीय लोगों की भागीदारी हो और उन्हें परियोजनाओं से होने वाले आर्थिक एवं सामाजिक लाभ का उचित हिस्सा मिले।

नाबार्ड के डीजीएम राकेश सिन्हा ने किसानों और ग्रामीण समुदायों तक कार्बन वित्त पहुंचाने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने नाबार्ड की विभिन्न योजनाओं और वित्तीय सहयोग के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में जलवायु अनुकूल परियोजनाओं को प्रोत्साहित करने की संभावनाओं को सामने रखा।

वहीं, पूर्व पीसीसीएफ डॉ. एच.एस. गुप्ता ने कार्बन मार्केट को पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के लिए महत्वपूर्ण बताया। पीसीसीएफ (वेटलैंड) ए.टी. मिश्रा ने आर्द्रभूमि संरक्षण और जैव विविधता संवर्धन में कार्बन मार्केट की भूमिका को रेखांकित किया।

कार्बन मार्केट एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके माध्यम से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने या वातावरण से कार्बन हटाने वाली प्रमाणित गतिविधियों को आर्थिक मूल्य दिया जा सकता है।

आसान शब्दों में समझें तो यदि कोई परियोजना वैज्ञानिक रूप से यह साबित करती है कि उसने वातावरण में कार्बन उत्सर्जन कम किया है या कार्बन को प्राकृतिक रूप से अवशोषित करने की क्षमता बढ़ाई है, तो निर्धारित नियमों के तहत उससे कार्बन क्रेडिट तैयार हो सकते हैं। इन क्रेडिट का उपयोग संबंधित बाजार व्यवस्था में किया जा सकता है।

झारखंड में कृषि वानिकी, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, खराब हो चुकी भूमि का पुनर्स्थापन, आर्द्रभूमि संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा जैसी गतिविधियां कार्बन वित्त की संभावनाएं पैदा कर सकती हैं।

इससे किसानों को अपनी जमीन पर पेड़ लगाने, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने और टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन मिल सकता है। हालांकि, इसके लिए परियोजनाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन, पारदर्शी निगरानी और कार्बन क्रेडिट का स्वतंत्र सत्यापन जरूरी होगा।

कार्यशाला में CLIMATEX के निदेशक विजय ने बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य झारखंड में जलवायु अनुकूल कृषि, कृषि वानिकी और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए कार्बन वित्त की संभावनाओं पर विचार-विमर्श करना था।

इस दौरान CLIMATEX की ओर से वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के लिए किए गए व्यवहार्यता अध्ययन के निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए।

कार्यशाला की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि डिजिटल मापन, रिपोर्टिंग एवं सत्यापन यानी Digital Measurement, Reporting and Verification (dMRV) उपकरण का प्रदर्शन रहा। इस तकनीक के माध्यम से उपग्रह चित्रों और वैज्ञानिक मॉडलों की मदद से जैवभार और मृदा कार्बन भंडार का आकलन किया जा सकता है।

इस तरह की तकनीक कार्बन परियोजनाओं की निगरानी को अधिक वैज्ञानिक और पारदर्शी बनाने में सहायक हो सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किसी परियोजना के तहत वास्तव में कितना कार्बन संग्रहित हुआ है और पर्यावरण को कितना लाभ मिला है।

इसी अवसर पर झारखंड के लिए तैयार की गई ‘Climate Hazard Mapping For Jharkhand’ रिपोर्ट का भी विमोचन किया गया। इस रिपोर्ट के माध्यम से राज्य में जलवायु संबंधी खतरों और संवेदनशील क्षेत्रों को समझने तथा भविष्य की योजनाओं को बेहतर बनाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में सरकारी योजनाओं को कार्बन मार्केट से जोड़ने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। इसके अलावा मिश्रित एवं परोपकारी वित्त, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और प्रभाव निवेश के माध्यम से जलवायु अनुकूल परियोजनाओं का विस्तार करने की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी योजनाओं, वित्तीय संस्थानों और निजी क्षेत्र के सहयोग से ऐसी परियोजनाओं को आर्थिक मजबूती मिल सकती है, जिनका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों की आय बढ़ाना है।

कार्यक्रम में नाबार्ड, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, जर्मन विकास सहयोग संस्था GIZ, क्लाइमेट पॉलिसी इनिशिएटिव (CPI), झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (JSLPS), प्रदान (PRADAN), सोशल अल्फा, हिंडाल्को, सिंजेंटा फाउंडेशन और एक्सीसिट-एक्सएलआरआई-नाबार्ड इन्क्यूबेशन सेंटर सहित विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम की शुरुआत वन प्रमंडल पदाधिकारी (DFO) अनुराधा मिश्रा के स्वागत भाषण से हुई।

झारखंड में कार्बन मार्केट की संभावनाओं पर हुई यह कार्यशाला राज्य के पर्यावरणीय भविष्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण चर्चा का मंच रही। इसमें स्पष्ट किया गया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों, वित्तीय संस्थानों, विशेषज्ञों और निजी क्षेत्र की भागीदारी भी जरूरी है।

हालांकि, कार्बन वित्त से किसानों और जनजातीय समुदायों को वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा। परियोजनाओं में स्थानीय लोगों की सहमति, पारदर्शी वित्तीय व्यवस्था, भूमि अधिकारों का सम्मान, वैज्ञानिक सत्यापन और लाभ का उचित वितरण सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।