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Nepal floods : नेपाल में भीषण तबाही क्यों मची? अचानक आई बाढ़ का ISRO ने सैटेलाइट तस्वीरों से खोला राज

Megha Sinha

Nepal floods : नेपाल के रसुवा में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे ग्लेशियर ढहने, बर्फ-चट्टानों के मलबे और नदी के अस्थायी रूप से रुकने की आशंका; NRSC की सैटेलाइट तस्वीरों ने पूरी घटनाक्रम की अहम कड़ियां जोड़ीं।

Nepal floods : नेपाल के रसुवा में आई अचानक बाढ़ की वजह क्या थी? ISRO के NRSC ने सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए ग्लेशियर और नदी में हुए बदलावों का आकलन किया है। जानिए कैसे ग्लेशियर collapse, ice-rock avalanche और अस्थायी नदी अवरोध ने भयावह फ्लैश फ्लड को जन्म दिया।

Nepal floods : नेपाल के रसुवा जिले में 26 अगस्त 2026 को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को झकझोर दिया है। कुछ ही समय में पानी, कीचड़, बड़े-बड़े पत्थरों और मलबे का तेज बहाव नदी घाटियों में फैल गया और सड़क, पुल, बस्तियों तथा दूसरी महत्वपूर्ण संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचा। इस अचानक आई आपदा के पीछे आखिर क्या हुआ? भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO की शाखा नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर घटनाक्रम को समझने की कोशिश की है।

शुरुआती आकलन में संकेत मिले हैं कि आपदा की शुरुआत नेपाल-तिब्बत सीमा के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में हुई। वहां ग्लेशियर का एक हिस्सा ढहने के बाद बर्फ और चट्टानों का भारी मलबा नीचे आया होगा। इसके बाद नदी का रास्ता अस्थायी रूप से बाधित हुआ और पानी जमा होने के बाद अचानक यह प्राकृतिक अवरोध टूट गया। इससे पानी और मलबे की बेहद तेज लहर नीचे की ओर दौड़ी और भोटेकोशी-त्रिशूली नदी प्रणाली में तबाही मच गई।

आपदा के बाद NRSC ने विभिन्न सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल कर प्रभावित क्षेत्र का जियोस्पेशियल असेसमेंट किया। रिपोर्टों के अनुसार वैज्ञानिकों ने आपदा से पहले की तस्वीरों की तुलना आपदा के बाद प्राप्त तस्वीरों से की। इस तुलना से पहाड़ी इलाके, ग्लेशियर क्षेत्र, नदी के रास्ते और बाढ़ से प्रभावित हिस्सों में आए बड़े बदलावों को पहचानने में मदद मिली।

NRSC के आकलन में Resourcesat-2A की आपदा के बाद की तस्वीरों को अहम माना गया है। इसके साथ पहले की सैटेलाइट इमेजरी से तुलना कर यह देखा गया कि बाढ़ के बाद नदी का प्रवाह और आसपास का भूभाग किस तरह बदल गया। सैटेलाइट डेटा ने ऊंचाई वाले क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भू-भाग और बर्फ के खिसकने के संकेत भी दिए हैं।

यही तस्वीरें वैज्ञानिकों को उस घटनाक्रम को समझने में मदद कर रही हैं, जिसमें एक ऊंचे पहाड़ी क्षेत्र में शुरू हुई घटना कुछ ही समय में कई किलोमीटर दूर स्थित नदी घाटी के लिए विनाशकारी साबित हुई।

शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के अनुसार, ग्लेशियर collapse या ice-rock avalanche इस आपदा की महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है। ऊंचे हिमालयी इलाके में ग्लेशियर का कोई हिस्सा टूटकर नीचे गिरता है तो उसके साथ बर्फ, चट्टान और मिट्टी का विशाल मलबा भी तेजी से नीचे आता है।

अगर यह मलबा नदी के रास्ते में पहुंचकर उसे रोक दे, तो कुछ समय के लिए पानी का बहाव बाधित हो सकता है। इस दौरान पीछे की ओर पानी जमा होकर एक अस्थायी प्राकृतिक जलाशय जैसा रूप ले सकता है। जब मलबे की दीवार अचानक टूटती है, तो जमा हुआ पानी और मलबा एक साथ बेहद तेज गति से नीचे की ओर बढ़ता है। यही प्रक्रिया फ्लैश फ्लड को जन्म दे सकती है।

नेपाल के अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने भी शुरुआती स्तर पर ऐसी ही संभावना जताई थी। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, सैटेलाइट तस्वीरों से नदी के रास्ते में मलबे के कारण अस्थायी अवरोध बनने और उसके बाद उसके टूटने की संभावना सामने आई थी।

इस घटना को लेकर शुरुआती रिपोर्टों में भूकंप की भूमिका की भी चर्चा हुई। कुछ शुरुआती आकलनों में 4.9 तीव्रता के भूकंपीय झटके को ग्लेशियर के ढहने से जोड़कर देखा गया था। हालांकि, इस बिंदु पर एक महत्वपूर्ण अपडेट सामने आया है।

बाद के विश्लेषण में US Geological Survey (USGS) ने कहा कि शुरुआती तौर पर जिस घटना को भूकंप माना गया था, वह वास्तव में ग्लेशियर के ढहने और उससे पैदा हुए मलबे की गति से उत्पन्न भूकंपीय सिग्नल हो सकता है। यानी फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि बाढ़ निश्चित रूप से किसी 4.9 तीव्रता के भूकंप से शुरू हुई थी।

इसलिए वैज्ञानिक जांच के इस चरण में ग्लेशियर collapse और ice-rock debris flow को प्रमुख संभावित कारण माना जा रहा है, जबकि पूरी प्रक्रिया को लेकर अध्ययन अभी जारी है।

इस घटना के संदर्भ में Cirque Glacier यानी सर्क ग्लेशियर का नाम भी सामने आया है। यह ऐसा ग्लेशियर होता है जो पहाड़ की कटोरे जैसी प्राकृतिक आकृति वाले हिस्से में विकसित होता है। लंबे समय तक बर्फ जमा होने और उसके दबाव से यहां ग्लेशियर का निर्माण होता है।

ऐसे ऊंचाई वाले ग्लेशियरों में तापमान, बर्फ की स्थिति, चट्टानों की स्थिरता और मौसम में बदलाव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि ग्लेशियर का कोई हिस्सा अचानक अस्थिर होता है और टूटकर नीचे गिरता है, तो वह अपने साथ भारी मात्रा में बर्फ और चट्टानों को भी बहा सकता है।

रसुवा की घटना में वैज्ञानिकों को इसी तरह की एक श्रृंखलाबद्ध प्रक्रिया के संकेत मिले हैं—पहले ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान का हिस्सा टूटना, फिर मलबे का नीचे आना, नदी का रास्ता रुकना और आखिरकार पानी-मलबे का अचानक मुक्त होकर नीचे की ओर दौड़ना।

इस घटना की एक खास बात यह भी है कि शुरुआती स्थानीय आकलनों में भारी बारिश को मुख्य कारण नहीं माना गया। नेपाल के मौसम एवं जल विज्ञान विभाग से जुड़ी रिपोर्टों में कहा गया था कि घटना के समय रसुवा में ऐसी भारी वर्षा नहीं हुई थी जो इतने अचानक और शक्तिशाली बाढ़ प्रवाह को समझा सके। इससे वैज्ञानिकों का ध्यान ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में हुए किसी अचानक भू-हिमानी बदलाव की ओर गया।

यही कारण है कि सैटेलाइट तस्वीरें इस जांच में बेहद महत्वपूर्ण बन गई हैं। जमीन पर मौजूद टीमें जहां बाढ़ के बाद के हालात देख रही हैं, वहीं अंतरिक्ष से मिली तस्वीरें यह पता लगाने में मदद कर रही हैं कि पानी और मलबा आखिर कहां से आया और उसने नदी के रास्ते को किस तरह बदला।

रसुवा की घटना केवल एक स्थानीय आपदा नहीं है, बल्कि यह पूरे हिमालयी क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक जोखिमों की याद दिलाती है। हिमालय में हजारों ग्लेशियर, ग्लेशियल झीलें और बेहद अस्थिर पहाड़ी ढलान मौजूद हैं। यहां ग्लेशियर टूटने, भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक नदी में पानी बढ़ने जैसी घटनाएं बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों के कारण भविष्य में ऐसे जोखिमों पर और अधिक निगरानी की जरूरत होगी।

नेपाल की रसुवा बाढ़ ने एक बार फिर साबित किया है कि सैटेलाइट तकनीक आधुनिक आपदा प्रबंधन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। बाढ़, भूस्खलन, जंगल की आग, चक्रवात या ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं में सैटेलाइट कुछ ही समय में बड़े क्षेत्र की तस्वीर उपलब्ध करा सकते हैं।

NRSC द्वारा आपदा से पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना से प्रभावित क्षेत्र की पहचान, नदी के बदले हुए मार्ग का अध्ययन और मलबे के फैलाव का आकलन संभव हुआ है। इससे राहत एवं बचाव एजेंसियों को प्राथमिकता वाले इलाकों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। नेपाल की इस घटना के लिए International Charter Space and Major Disasters ने भी सक्रियता दर्ज की है और NRSC तथा ISRO को इसमें योगदान देने वाली संस्थाओं में शामिल किया है।

रसुवा में आई अचानक बाढ़ के पीछे फिलहाल सबसे मजबूत वैज्ञानिक संभावना ग्लेशियर के ढहने, बर्फ-चट्टानों के मलबे से नदी के अस्थायी अवरोध और उसके बाद पानी के अचानक मुक्त होने की है। शुरुआती भूकंप वाली व्याख्या को बाद के USGS विश्लेषण ने चुनौती दी है, इसलिए इस घटना को सीधे भूकंप से जोड़ना अभी उचित नहीं होगा।

ISRO-NRSC की सैटेलाइट तस्वीरों ने इस प्राकृतिक आपदा की कड़ियों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आने वाले दिनों में और अधिक उच्च-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट डेटा तथा जमीनी वैज्ञानिक जांच से यह और स्पष्ट हो सकता है कि हिमालय की ऊंचाई पर वास्तव में कौन-सी घटना शुरू हुई थी और उसने इतनी तेजी से विनाशकारी बाढ़ का रूप कैसे लिया।