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झारखंड की जनता के बीच सबसे लोकप्रिय नेताओं में सबसे प्रभावशाली है हेमंत, मुश्किलों का डट कर करते है सामना

News Desk

झारखंड की प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और उनसे जुड़ी कई इकाइयों के साथ-साथ, बार-बार राज्यपाल द्वारा हेमन्त सरकार पर की जा रही चोट तथा अन्य केन्द्रीय एजेंसियों से मिल रही समन के बावजूद भी आखिर हेमन्त सरकार पर कोई फर्क क्यों नहीं पड़ रहा। आखिर क्या वजह है कि महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार व मध्य प्रदेश की कमलनाथ की सरकार उखड़ गई, पर जिस सरकार को उखाड़ने के लिए कभी चुनाव आयोग, तो कभी ईडी, कभी खनन, कभी भ्रष्टाचार का सहारा लिया गया, इसके बावजूद भी हेमन्त सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा।

यह सरकार आराम से चलती भी जा रही है, आगे भी अब इसको कही से कोई खतरा नहीं दिख रहा, साथ ही 2024 में होनेवाले लोकसभा व विधानसभा चुनाव में भी यह सरकार केन्द्र की सरकार को चुनौती देने तथा विधानसभा में फिर से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को लेकर आशान्वित क्यों हैं? क्या कभी किसी ने इस पर विचार किया है?

हमारे कई ऐसे राजनीतिक पंडित मित्र हैं। जब खनन मामले को लेकर चुनाव आयोग के पत्र और राजभवन से संबंधित समाचारों की अखबारों में सुर्खियां बनने लगी तो उन्होंने हमसे कई बार बाजियां लगाई, वे उस वक्त कहां करते थे कि देखियेगा, ये सरकार दो से तीन महीने के अंदर चली जायेगी। मैं बार-बार कहता कि मुझे तो कही से नहीं दिख रहा कि ये सरकार जा भी रही है। जब ईडी ने सीएम हेमन्त सोरेन को समन भेजा तब तो उक्त पत्रकार महाशय ने कहा कि अब देखियेगा, उनकी बात सच होनेवाली है, हेमन्त सोरेन गये, वे गिरफ्तार होंगे और उनकी जगह पर हो सकता है कि उनकी पत्नी मुख्यमंत्री की शपथ ले लें।

उन राजनीतिक पंडित मित्र का यह बयान सुनकर मेरी हंसी नहीं थमी। मैंने कहा कि चलिये, आपका ये भी बयान हम आजमा लेते हैं। वो बाते भी हवा-हवाई हो गई। मैं उक्त पत्रकार मित्र/राजनीतिक पंडित का नाम यहां नहीं देना चाहता, क्योंकि किसी के सम्मान के साथ खेलना, मैंने कभी नहीं सीखा। हर व्यक्ति किसी न किसी संस्थान व संगठन से जुड़ा रहता है और उसके प्रति उसकी ईमानदारी-सहानुभूति रहती हैं, जिसको लेकर उसके समर्थन में वो व्यक्ति बातें करता है।

मैं हेमन्त सोरेन को तब से जानता हूं, जब वे राजनीति में सक्रिय नहीं थे, बल्कि वे अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे। उनसे मेरी पहली मुलाकात धनबाद में हुई थी, जब मैं धनबाद दैनिक जागरण में कार्यरत था। तब से लेकर आज तक मैंने यही उनमें देखा कि उनमें कुछ ऐसे गुण हैं, जो उन्हें झारखण्ड के अन्य राजनीतिज्ञों से अलग करती है। वे यारों के यार हैं। उन्हें और कुछ भले ही मालूम न हो, पर उन्हें ये पता है कि झारखण्ड के लोगों को क्या चाहिए और बस यही दो बातें उनके लिए काफी अहम रखती है, तभी तो वे कई दलों के साथ मिलकर झारखण्ड में भारी झंझावातों के बीच भी सरकार चला रहे हैं।

याद करिये, दिसम्बर 2019 में उन्होंने जब शासन संभाला। शासन संभालते ही कोरोना ने पूरे देश को 2020 में जकड़ लिया। इस कोरोना से झारखण्ड भी अछूता नहीं था। झारखण्ड की स्थिति तो और भी दयनीय थी, क्योंकि यहां के ज्यादातर लोग गरीब, विस्थापन व पलायन के शिकार रहे हैं। पूर्व की सरकार ने तो झारखण्ड की आर्थिक स्थिति को गर्त में मिला दिया था, तभी तो हेमन्त सरकार को इस पर श्वेत पत्र जारी करना पड़ा। फिर भी कोरोना में कोई झारखण्डी भूख से न मरें या जो प्रवासी मजदूर झारखण्डी हैं, उन्हें किसी प्रकार का कोई दिक्कत न हो, इस पर उनका ध्यान गया।

जरा कोई बता सकता है कि कोरोना काल में देश के किस राज्य में पुलिस थाने में लंगर चला करते थे? उत्तर होगा – एक मात्र वो राज्य था, झारखण्ड। आखिर यह कैसे संभव हुआ? ये हेमन्त सरकार की ही देन थी। यानी जिस पुलिस थाने का नाम सुनकर लोग हरकते थे, वहां उस वक्त लंगर चल रहा था, कई संपन्न लोग व राज्य सरकार के अधिकारी व कर्मचारी थाने में जाकर अनाज व सब्जियों की बोरी पहुंचाते तो कई गरीब जैसे रिक्शाचलानेवाले, भीख मांगनेवाले, रोजमर्रा की जिंदगी जीनेवाले, जिनकी जिंदगी मौत में तब्दील होने को मजबूर थी, उन्होंने सुबह-दोपहर-शाम जाकर जमकर खाना खाया, ये काम महीनों चलता रहा।

जब सरकार को पता चला कि दक्षिण भारत में कोरोना के कारण झारखण्डियों की जीवन तबाह हो रही है, तो हेमन्त सोरेन ने केन्द्र सरकार से गुहार लगाकर तेलंगाना से झारखण्ड के लिए मजदूरों के लिए स्पेशल ट्रेन चलवा दी। जरा पूछिये, उस वक्त तो बिहार में नीतीश कुमार भाजपा की कृपा से ही सरकार चला रहे थे, उन्होंने अपने बिहारी मजदूरों के लिए कहां से और कौन सी ट्रेनें चलवाई, जबकि बिहार के कई मजदूर पैदल ही कई राज्यों से आने को मजबूर हुए और कई रास्ते में ही दम तोड़ दिये, जो अखबारों की सुर्खियां भी बनीं।

यही नहीं, लद्दाख से तो मजदूर एरोप्लेन से बुलवाये गये। याद करिये, भारत-चीन सीमा पर संथाल के मजदूरों से काम तो लिया जाता था। पर उन्हें उचित मजदूरी नहीं दी जाती थी। सीमा सड़क संगठन के लिए ये काम करनेवाले मजदूरों से ठेकेदार काम तो लेते थे, पर उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रखते थे। मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने पहल की और उस ओर ध्यान दिया। नतीजा हल निकला। आज वहां संथाल के मजदूर काम कर रहे हैं और सरकार की उन पर नजर भी है।

किसी भी नेता को गाली दे देना और उसे समझना दोनों अलग-अलग बातें हैं। आप हेमन्त सोरेन को गाली देते हैं, पर ये भी जानिये कि उन्होंने राज्य की जनता के लिए क्या किया? कोरोना से बचने के लिये जब टीके की बात आई तो उन्होंने अपने नागरिकों को टीका उपलब्ध कराने के लिए विशेष पहल की, जबकि उस वक्त उन टीका को रखने के लिए संसाधन भी उपलब्ध नहीं थे।

मतलब दो साल तो कोरोना से लड़ने और अपने नागरिकों को बचाने में ही यह व्यक्ति अपना समय ईमानदारी से लगाया और जैसे ही जब काम करने की बारी आई, यानी तीसरा साल चढ़ा तो लोगों को याद आया कि हेमन्त सोरेन ने कौन-कौन सी गड़बड़ियां की? आश्चर्य है कि जिन-जिन लोगों ने जिन-जिन गड़बड़ियों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया। उन्हें ही कोई सफलता नहीं मिली।

इन गड़बड़ियों वाली राजनीति में राजभवन की भूमिका भी संदिग्ध रही। बार-बार महागठबंधन के नेता यहां तक की मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन भी उस वक्त मीडिया में आ रही खबरों को लेकर राजभवन गये, पर उन्हें कोई सफलता नहीं मिली, ले-देकर हेमन्त सोरेन को मानसिक प्रताड़ना ही मिली। ये दौर था – राज्यपाल रमेश बैस का जो आज महाराष्ट्र के राज्यपाल हैं। नये राज्यपाल सी पी राधाकृष्णन आये। लगा कि ये कुछ बेहतर साबित होंगे पर जिस प्रकार से उनके भी बयान आ रहे हैं और जिस प्रकार से वे गांवों-टोलों में जाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सम्मानपूर्वक नाम लेते हैं, वैसे ही प्रकार से राज्य के मुख्यमंत्री का नाम लेते उन्हें राज्य की जनता ने अब तक नहीं देखा।

ऐसा नहीं कि राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने राज्य की जनता को कुछ नहीं दिया। मॉब लीचिंग विधेयक, स्थानीय नीति, आरक्षण विधेयक आदि जो विधानसभा से पारित होकर आज भी राजभवन और विधानसभा के बीच लटका हुआ हैं, आखिर वो क्या है? देश के प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्रियों का समूह, विधायक, सांसद ओल्ड पेंशन स्कीम के मजे लें और केन्द्रीय कर्मचारी व राज्य कर्मचारी न्यू पेंशन स्कीम में जाकर अपना आगे का जीवन बर्बाद कर लें, आखिर ये क्या है? जब न्यू पेंशन स्कीम ही ठीक हैं तो फिर यहीं न्यू पेंशन स्कीम विधायकों, सांसदों को भी क्यों न प्राप्त हो, ये दोहरा मापदंड क्यों?

आप कहेंगे कि इससे विकास प्रभावित होता है, एक पत्रकार से राज्यसभा गया व्यक्ति हमेशा दैनिक भास्कर में इस मुद्दे पर प्रवचन देता हैं, पर वो ये नहीं कहता कि हम नेताओं को भी न्यू पेंशन स्कीम में डाल दिया जाये, इससे सारा झंझट ही खत्म हो जाता। लेकिन जनता को परेशानी में डालो और खुद रसमलाई खाओ, नेता बनने के बाद यहीं ज्यादातर लोगों को सूझता है। पर झारखण्ड में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने ये दूरियां ही मिटा दी। अपने राज्य के सारे अधिकारियों व कर्मचारियों को ओल्ड पेंशन थमा दी। तो इसमें हेमन्त सोरेन ने क्या गलत किया?

आज भी यह व्यक्ति अपने राज्य की बेहतरी के लिए केन्द्र से खनिज की रॉयल्टी और अपनी बकाया राशि मांगता हैं तो इसमें गलत क्या है? कमाल है हाथी उड़ानेवाले, मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर करोड़ों फूंक देनेवाले, जिनके शासनकाल में एक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ने अपनी पत्नी और ससुर को कहां से कहां तक पहुंचा दिया, वे जनता को ठेंगा दिखानेवाले राजनीतिज्ञ, हेमन्त सोरेन से पूछते है कि उन्होंने इन साढ़े तीन सालों में क्या किया?

अब बात विधि-व्यवस्था की। क्या पूर्व में विधि व्यवस्था ठीक थी? क्या ये सही नहीं है कि रांची का अलबर्ट एक्का चौक इस बात का कई बार साक्षी रहा कि वहां कैसे लोगों ने एक लड़की के बलात्कार के बाद हुई उसकी नृशंस हत्या के बाद आंदोलन किये थे। खुद उस वक्त के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने दोषियों को दंड देने की बात कही थी, पर क्या उसे दंड मिला?

धुर्वा में उसी मुख्यमंत्री ने एक बेबस पिता के साथ कैसी हरकत की थी, उसका वीडियो तो आज भी यू-ट्यूब पर मौजूद है। कैसे जहरीली शराब पीकर लोग रांची में ही मरे थे? कैसे उक्त मुख्यमंत्री ने विधानसभा में अपने विपक्षी दल के नेताओं के लिए कौन से शब्द का प्रयोग किया था और वही मुख्यमंत्री गढ़वा में जाकर एक जाति विशेष के लोगों के खिलाफ अनर्गल बयान भी दिया था, जिससे उक्त जाति के लोग पूरे राज्य में आंदोलित हो गये थे।

कमाल हैं, कड़वा-कड़वा थू-थू और मीठा-मीठा, चप-चप। ऐसे थोड़े ही होता है। क्या कोई बता सकता है कि हेमन्त सोरेन ने सदन में किस विपक्षी नेता के खिलाफ आपत्तिजनक बयान दिये। हमने तो देखा कि जब अपने परिवार के सदस्य के इलाज के लिए हेमन्त सोरेन हैदराबाद गये, तब उन्हें पता चला कि रांची के भाजपा सांसद संजय सेठ वहां इलाजरत है। वे सीधे वहां उनसे मिलने गये। उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना की।

आश्चर्य यह भी कि मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन जब भाजपा सांसद संजय सेठ से मिले, उनकी फोटो डाली तब जाकर भाजपा के कई नेताओं को पता चला कि संजय सेठ की तबियत खराब है, और वे हैदराबाद में ईलाजरत है। इधर जब भाजपाइयों को पता चला तो कुछ भाजपा के बड़े नेताओं ने फोटो में दिख रहे हेमन्त सोरेन को हटाकर केवल सांसद संजय सेठ का फोटो ही अपने सोशल साइट पर लगाया,  मतलब इतनी घृणा कहां से लोग लाते हैं? उधर जब दीपक प्रकाश की तबियत खराब हुई, वे सीधे रांची के उक्त अस्पताल गये, जहां वे भर्ती थे।

मतलब, वैचारिक दूरियों के बावजूद, अपने मन में कभी घमंड नहीं लाना और न किसी को हीन भावना से देखना यहीं खूबी हेमन्त सोरेन में हैं, जो उन्हें आज भी झारखण्ड में लोकप्रियता के शिखर तक पहुंचा दी है। मैंने कई बार देखा, जब उनके पास कोई सामान्य जनता पहुंचती है, तो वे खुद उससे इस प्रकार बातें करते हैं कि वो सामान्य जनता को लगता ही नहीं कि वो किसी बड़े आदमी या मुख्यमंत्री से बातें कर रहा हैं।

उदाहरण, एक फटी-पुरानी साड़ी में एक महिला मुख्यमंत्री आवास में बैठी थी, शायद उसकी कोई समस्या थी, उसे न तो लिखना आता था और न ही ठीक से अपनी बातें रख पा रही थी, मैंने देखा कि मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन उसके पास आराम से जाकर बैठ गये और उसी की भाषा में बातें करने लगे, बेचारी महिला रो-धोकर जो बातें बताई, उन्होंने बातों को ध्यानपूर्वक सुना और उसी समय संबंधित अधिकारी को उसकी समस्या का निदान करने के लिए कह दिया, लीजिये समस्या समाधान।

पहले क्या होता था, तो एक केन्द्र खुला हुआ था। नाम था उसका – मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र। वो केन्द्र चलाता कौन था। तो एक बहुत बड़ा व्यापारी। जिसका भाजपा से गहरा नाता था। इस केन्द्र से जनता को भला हुआ हो या नहीं, पर मैं जानता हूं कि उससे वो व्यापारी की तो किस्मत ही बदल गई। करोड़ों का भुगतान जो होता था। इस केन्द्र में वही समस्याएं आती थी, जिस पर व्यापारी महोदय की कृपा होती थी, बाकी समस्याएं तो गौण थी। इस केन्द्र की गतिविधियों के बारे में निर्दलीय विधायक सरयू राय ने 2020 में बजट सत्र के दौरान सदन में सवाल भी उठाए थे। उस वक्त सदन में मंत्री ने कहा था कि वे इस मामले की जांच करवा लेते हैं, पर पता नहीं जांच हुई भी या नहीं।

आज भी ईमानदारी से उक्त मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की गतिविधियों की जांच हो जाये, तो फिर देखिये कितने लोगों की क्या हालत होती हैं, पर कितना उघारियेगा, यहां तो जहां उघारियेगा, कुछ न कुछ दिख जायेगा। लेकिन यहां तो दूसरे का दिखता है, अपना कुछ नहीं दिखता। लेकिन जो वर्तमान में राजनीतिक परिस्थितियां दिख रही हैं, फिलहाल पूरे प्रदेश में हेमन्त सोरेन के आस-पास कोई राजनीतिज्ञ टिकता हुआ नहीं दिख रहा। आज भी जनता के बीच लोकप्रिय नेताओं में शिखर पर हेमन्त सोरेन ही हैं।

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