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बड़ी सौगात: रांची के रिम्स में किडनी ट्रांसप्लांट का रास्ता साफ, गरीबो को होगा बड़ा फायदा

Arti Agarwal

रांची के रिम्स में अब किडनी ट्रांसप्लांट किया जा सकेगा। रिम्स में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए करीब 60 वर्षो का लंबा इंतज़ार करना पड़ा। 1960 में रिम्स की स्थापना के बाद से ही रिम्स में किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा देना एक सपने जैसा था। सोमवार को झारखंड सरकार के प्रयासों की वजह से रिम्स में एक नेफ्रोलॉजिस्ट के जुड़ने के साथ ही राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट का भी रास्ता साफ हो गया। रिम्स निदेशक ने बताया की यदि किसी मरीज को डोनर मिलता है तो बाहर से सर्जन बुलाकर रिम्स में मरीज का किडनी ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। इसके लिए रिम्स ओटी पूरी तरह से अपडेट है। जहां तक ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए लाइसेंस लेने की बात है, तो यह भी आसानी से मिल जायेगा। राज्य के कई निजी अस्पतालों को इसका लाइसेंस मिला है।

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निदेशक ने कहा की जैसे ही कोई डोनर मिलेगा, वैसे ही शुरूआती दौर में निःशुल्क किडनी ट्रांसप्लांट का काम शुरू कर दिया जायेगा। लॉकडाउन खुलने के बाद नियमित रूप से नेफ्रोलॉजी की ओपीडी सेवा भी शुरू की जाएगी। नेफ्रोलॉजी विभाग में ओपीडी का संचालन सप्ताह में तीन दिन किये जाने की योजना है। ट्रामा सेंटर में चल रही डायलिसिस की चार मशीने है, इसकी संख्या भी 10 तक बढ़ाई जाएगी।

नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा पंत ने ज्वाइन किया :

सोमवार को बीएचयू की नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा पंत ने रिम्स में योगदान दिया। इससे पहले वे रांची के ही एक निजी अस्पताल में अपनी सेवा दे रही थी। सुपर स्पेशलिटी ओंकोलॉजी विभाग में अब किडनी के मरीजों का इलाज भी विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा किया जायेगा।

निजी अस्पतालों में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए करीब 8 लाख रूपये तक खर्च आता है :

निदेशक ने बताया कि इस व्यवस्था के बाद रिम्स में एक नई शुरुआत हो सकती है, जिसमें किडनी प्रत्यारोपन के लिए लोगों को सस्ती दर पर सुविधा मिल जाएगी। निजी अस्पतालों में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए करीब आठ लाख रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। साथ ही रिम्स में गंभीर बीमारी योजना के अंतर्गत मरीजों का नि:शुल्क इलाज भी हो सकेगा। कई मरीज निजी अस्पतालों में डायलेसिस कराने के लिए जाते थे। जिसमे उन्हें इसी काम के लिए काफी पैसे खर्च करने पड़ते थे। वहीं किडनी के इलाज के लिए दुसरे राज्यों में जाना पड़ रहा था। इलाज कराने में तो कई लोगों के घर और जमीन तक गिरवी रखने की नौबत आ चुकी है। ऐसे में अब मरीजों को दुसरे राज्यों में भी नहीं जाना पड़ेगा।

80 प्रतिशत कार्य नेफ्रोलॉजिस्ट का होता है :

निदेशक ने बताया कि किडनी ट्रांसप्लांट में 80 प्रतिशत कार्य नेफ्रोलॉजिस्ट का होता है, जबकि 20 प्रतिशत कार्य ही सर्जन का होता है। बाहर से आने वाले सर्जन के साथ-साथ रिम्स के भी सर्जन को ट्रेंड किया जाएगा। उन्हें भी लगातार अपडेट कर इसके लिए तैयार किया जाएगा। उन्होंने बताया कि डायलिसिस के दौरान ही मरीजों को तैयार कर लिया जाता है, इसमें अधिक वक्त नहीं लगता है। एक सप्ताह के अंदर ट्रांसप्लांट किया जा सकता है।

हमारे पास पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार है – डॉ अरशद जमाल, यूरोलॉजिस्ट :

यूरोलॉजिस्ट डॉ. अरशद जमाल ने कहा कि हमारे पास पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार है। तत्काल ऑपरेशन करने के लिए हमारे पास सारी सुविधाएं हैं। कुछ पेपर वर्क बचा है, जिसे पूरा करने के बाद पहला किडनी ट्रांसप्लांट कर दिया जाएगा। वहीं ऐसी व्यवस्था की जाएगी कि मरीजों को बार बार किडनी ट्रांसप्लांट प्रॉसेस के लिए विभाग के पास दौड़ न लगानी पड़े।

कमजोर तबके के लोगों को भी व‌र्ल्ड क्लास की फैसिलिटी मिलेगी – डॉ प्रज्ञा पंत, नेफ्रोलॉजिस्ट :

नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा पंत ने कहा कि मुझे डायरेक्टर ने जिस भरोसे से जिम्मेवारी सौंपी है, उस पर काम करना है। डायलेसिस यूनिट पर जल्द ही काम शुरू होगा, जहां कमजोर तबके के लोगों को भी व‌र्ल्ड क्लास की फैसिलिटी मिलेगी। डिपार्टमेंट को बढ़ाएंगे और नेफ्रोलॉजी के तहत आने वाले इलाज मरीजों को मुहैया कराए जाएंगे।

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