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@MyReportwithTNK, Story: झारखंडी बाबू @Third_ankh Blog: thesriankh.blogspot.com

जानिए अपने झारखंड की जनजाति और उनके परंपरा

कुछ लिखने से पहले मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं की मैं पिछले 6 महीनों से जे पी एस सी, की तैयारी कर रहा हूं और यह लेख मैंने जो लिखा है उसके लिए मैंने कोई शोध नहीं किया है मैंने जो भी लिखा है वह मेरा पढ़ाई का ही अंश है जिसे मैंने कुछ यूट्यूब और कुछ विकीपीडिया से प्राप्त किया है,
जैसा कि मेरे लेख का हैडलाइन है उस पर मैं कुछ लिखना चाह रहा था इसलिए मैंने सोचा क्यों ना झारखंड में रह रहे जनजातियों पर एक लेख लिखा जाए  तो आइए बात करते हैं की जनजातियों की परंपरा को। ना केवल एक सुदृढ़ समाज का गठन है बल्कि एक दूरदर्शिता भी है जनजातियों की कुछ परंपरा तो हरप्पा सभ्यता के वक्त की है। 
 सबसे पहले जानते हैं की झारखंड में कुल कितने जनजाति पाय जाते हैं
इसका जवाब है कुल 32 जनजाति झारखंड में अभी मौजूद है और वह उपयुक्त इस प्रकार है
संथाल, उरांव, मुंडा, हो, खरवार, खड़िया, भोमिज, लोहरा, गोंड, महली, माल पहाड़िया, चेरु, चिक बड़ाइक, सूर्या पहाड़िया, करमाली, कोरा, परिह्या, कोर्वा, असुर, गोड़ायत, बिरहोर, बिराज्या, बैगा, सब्र, खोंड, बथुदी, किसान, बंजारा, कोल,बिजिया, बेदिया और कंवर

इनमें से बिरहोर, कोरबा, असुर, सब्र, परीह्या,बिरजिया, माल पहाड़िया और सुरैया पहाड़िया आदिम जनजाति श्रेणी में आते हैं आदिम जनजाति इसका उच्चारण इंग्लिश में primitive tribe होता है।

झारखंड में कुछ गैर जनजाति लोग भी पाए जाते हैं जिन्हें हम सदान मूल से मानते हैं या जनजाति झारखंड की मूलनिवासी के तौर पर जानी जाती है

सदान मूल की कई उपजातियां होती हैं जैसे राओटिया,बड़ाइक,धानुका पान,प्रमाणिक,तंटी,संवंसी, भुनियां,कोस्टा,झोरा,रक्सेल,घंसी, गोसाईं,बारगाह, बाउरी,भांट, बिंद, गोड़ाएट, कांटू,लोहोडिया,खादरिता,सराक,मलार,कलवार और मोमिन।

इन जनजातियों का निवास झारखंड में कब से है और इनका स्रोत कहां से उत्पन्न हो ता है इस पर मैं बात नहीं करने वाला क्योंकि यह एक शोरोध का विषय है मैं तो इन सभी जनजातियों के कला उनके नृत्य और उनके रहन सहन खानपान उनके त्योहारों और उनके समाजिक गठजोड़ पर बात करने वाला हूं

सबसे पहले बात करना चाहता हूं उनके नृत्यों पर कई नृत्य इन जनजातियों में प्रचलित है आइए हम एक-एक कर उन पर नजर डालते हैं

छाओ नृत्य
इस नृत्य को झारखंड के सरायकेला बस्ती में प्रमुखता से मनाया जाता है यह नृत्य काफी प्रचलित है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि या विदेशों में भी प्रचलित है पहली बार विदेश में या नृत्य सरायकेला के राजकुमार स्वादेंदू नारायण के द्वारा प्रस्तुत किया गया था सन 19 38
इस नृत्य को कलाकार मुखौटा पहनकर करते हैं इसमें वह अपने भाव के द्वारा कहानी प्रस्तुत करते हैं कहानियों में वे पौराणिक और अपनी सभ्यता से जुड़ी हुई तत्वों का प्रदर्शन करते हैं ।
यह नृत्य दो प्रकार के होती है पहला हथियार धारा जिसमें वह वीर रस की कहानी को प्रदर्शित करते हैं दूसरा काली भंग धारा जिसमें व शृंगार रस की कहानी को प्रदर्शित करते हैं।

जदुर नृत्य
इस नृत्य का दूसरा नाम नीर सासुंकु नृत्य भी है यह नृत्य उरांव जनजाति में काफी प्रचलित है यह नृत्य प्रमुखता से  कलओम सिंगबोंगा त्योहार पर किया जाता है जो फागुन माह में होता है और सरहुल त्यौहार तक चलता है महिला और पुरुष दोनों मिलकर इस नृत्य को प्रस्तुत करते हैं।

जापी नृत्य
यह नृत्य सरहुल त्यौहार से आरंभ होता है और वह पर्व तक चलता है।

कर्म/लहू सा नृत्य
या नृत्य असाढ़ पर्व से आरंभ होकर सोहराई पर्व तक चलता है जो कार्तिक माह है यह नृत्य मुख्यता रूप से फसलों के काटे जाने और नई फसलों के रोपर जाने के उपलक्ष पर प्रस्तुत किया जाता है इस नृत्य में लहुसा गीत गाया जाता है

माघे नृत्य
यह नृत्य सोहराय पर्व के बाद आरंभ होता है और कल ओम सिंह बंगा पर्व तक चलता है।

पायका नृत्य
इस नृत्य में कलाकार सैनिक की वेशभूषा धारण कर नृत्य प्रस्तुत करते हैं मान्यता यह है कि इतिहास में पाइका उन लोगों को कहा जाता था जो इतिहास में जमीदार के सैनिक हुआ करते थे उन्हीं सैनिकों को याद करके इस नृत्य को किया जाता है और उनकी वीरता को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है

जत्रा नृत्य
यह नृत्य एक सामूहिक नृत्य है जिसमें स्त्री पुरुष एक दूसरे का हाथ पकड़ कर नृत्य करते हैं इस नृत्य का दूसरा नाम कोडिंग नृत्य भी है।

नचनी नृत्य
या एक  व्यावसायिक नृत्य है।

नेदुवा नृत्य
यह नृत्य केवल पुरुषों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है इस नृत्य के माध्यम से जनजाति अपनी रक्षात्मक शैली को प्रस्तुत करते हैं।

करिया झोमर नृत्य
यह नृत्य केवल महिलाओं के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है यह नृत्य घर पर जब कोई महिला बच्चे को जन्म देती है उस वक्त महिलाओं के द्वारा इस नृत्य को प्रस्तुत किया जाता है इस नृत्य को महिलाओं के द्वारा करने का मकसद अपने खुशी का इजहार करना होता है।

मुंडारी नृत्य
या नृत्य प्रमुखता से मुंडा जनजाति के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

गोन्न नित्य आर माघा नृत्य
या दोनों नृत्य हो जनजाति के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

कठोरवा नृत्य
छवो नृत्य की तरह ही इस नृत्य को मुखौटा पहनकर प्रस्तुत किया जाता है यह नृत्य केवल पुरुषों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

जनजातियों में भिन्न-भिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न नाटक प्रस्तुति की भी परंपरा है आइए कुछ नाटकों पर नजर डालते हैं।

जाट जतीन नाटक
इस नाटक के माध्यम से कुंवारे पुरुष और महिला वैवाहिक जीवन का नाट्य रूपांतर प्रस्तुत करते हैं। इसमें जट पुरुषों के रूप होते हैं और जाटी न महिलाओं के।
इसी प्रकार भाकौलीबंका नाटक भी होता है जिसमें भाकौली पुरुषों के आर बंका महिलाओं का किरदार अदा करते हैं।

समा चकेवा नाटक
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष को मनाया जाता है या नाटक जिसमें भाई और बहन के पवित्र रिश्ते को दर्शाया जाता है इस नाटक में समा चकेवा चूड़ा क और शाम भ नाम के किरदार होते हैं

डोल कछ नाटक
या नाटक केवल महिलाओं के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जब घर पर बरात आती है इस अवसर पर महिलाएं रात भर इस नाटक को प्रस्तुत करती हैं इस नाटक के माध्यम से महिलाएं तरह-तरह के अभिनय से मुख्यतः वैवाहिक जीवन की प्रस्तुति करती हैं।

कीर्तनिया नाटक
यह एक भक्ति नाटक है जिसमें जनजाति कृष्ण भगवान के लीलाओं और उनकी बचपन की लीलाओं की प्रस्तुति करते हैं।

जनजातियों में अनेक प्रकार के लोकगीत भी पाए जाते हैं अलग-अलग जनजातियों के अलग अलग लोकगीत होते हैं जिनमें से कुछ लोकगीत तो ऐसे हैं जो या तो विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्त होने के कगार पर खड़े हैं आइए कुछ ऐसे लोकगीत पर नजर डालते हैं

संथाल जनजाति के लोकगीत
इस जनजाति के प्रमुख लोकगीत है दूध (इसे  विवाह के टायम पर गाना पसंद करता है),लगदे,बघा,सोहराई, दहार,पतवार, गिलवारी, दाटा,घरोमजक,रिजा,झिका,देसाई,वीर सेरेन (जंगल में शिकार करने से पहले इस गीत को गाया जाता है)।

मुंडा जनजाति के लोकगीत
मुंडारी भाषा के लोकगीत जादुर(सरहुल),गेना,कर्मा (करमा पर्व पर),जर्गा, एंदी (विवाह के टाइम पर),जपी(फागुन में शिकार से पहले)।

हो जनजाति के लोकगीत
वा(सरहुल पर्व पर), हेयरे (धान की बुवाई से पहले),नूमनामा(नया अन्य खाने से पहले)।

उरांव जनजाति के लोकगीत
सरहुल, जत्रा, दूरियां, अषाढ़ी, कर्मा, माता , जदुरा।

अन्य लोकगीतों में झूमर गीत, धूम चक गीत, अंगनाई गीत, जै झनझन गीत(महिलाओं द्वारा गर्भाशय के पश्चात गाए जाने वाला गीत), दही धारा गीत(वर्षा ऋतु में देवस्थान में गाए जाने वाला गीत) प्रमुख है।

जनजातियों में वाद्य यंत्र की भी परंपरा रही है जैसे कि सुशीर वाद्य, तंतुवाद्य, ताल वाद्य।

झारखंड की चित्रकला शैली अपने आप में काफी सुदृढ़ है इनमें वह रंगो का भरपूर उपयोग करते हैं इन शैली में तीन प्रकार की शैली प्रमुख है

जादू पटिया चित्रकला शैली
यह चित्रकला दो शब्दों से मिलकर बनी है जाधव मतलब चित्रकला पटिया मतलब कपड़ा या कागज के छोटे-छोटे वाह टुकड़े जिन पर चित्रकारी की जाती हो या चित्रकला संथाल जनजाति में प्रचलित है इस शैली में कलाकार वंश परंपरा की तरह इसे अपनाते हैं कपड़े पर या कागज पर या चित्रकला किया जाता है कपड़े को 5 या 20 फीट लंबा डेढ़ फीट चौड़ा पट तैयार किया जाता है।

सोहराई चित्रकला शैली
यह चित्रकला सोहराई पर्व के अवसर पर किया जाता है इसमें जंगली जीव जंतुओं पशु पक्षियों एवं पेड़ पौधों की चित्रकारी की जाती है मान्यता यह है कि या चित्रकला हड़प्पा सभ्यता के समकालीन है दिवाली के तुरंत बाद आदिवासी अपने घर के दीवारों पर चित्र बनाते हैं सोहराई चित्रकारी में कला के देवता प्रजापति या पशुपति का चित्रण मिलता है।

कोहबर चित्रकला शैली
यह फारसी भाषा के शब्द को ह मतलब गुफा एवं हिंदी भाषा के शब्द वर मतलब दूल्हा से मिलकर बना है अर्थात कोहबर शब्द का अर्थ होता है गुफा में विवाहित जोड़ा विवाह के मौसम में की जाने वाली यह चित्रकारी है बिरहोर जनजाति इस कला में निपुण है।

धोकड़ा शैली
जनजातियों में माप तोल के लिए पायला का निर्माण होता है जिससे चावल आदि मापने का काम किया जाता है इस पायला का निर्माण धोकड़ा शैली से होता है पायला एक स्मृति चिन्ह के रूप में देश विदेश में लोकप्रिय है पायला के अतिरिक्त धोकड़ा शैली मुखोटे, रसोई के बर्तन, सजावट के लिए पशु पक्षी की मूर्तियां एवं मोमबत्ती स्टैंड आदि भी बनाए जाते हैं सिंधु घाटी सभ्यता से ही कंसा से को पिघलाकर मूर्ति डालने का प्रचलन या इस कला को सिरे पेडू यानी लुप्त मोम (लॉस्ट वैक्स) के नाम से जाना जाता है

अग्नि नृत्य
यह एक धार्मिक नृत्य है जिसमें जनजाति आग पर चलते हैं और विभिन्न प्रकार की कल आए प्रस्तुत करते हैं प्रमुखता से या नृत्य मांडा पर्व के उपलक्ष पर प्रस्तुत किया जाता है।

आज के जनजाति समुदाय भी अपनी कला अभिव्यक्ति के लिए लुप्त मोम की प्रक्रिया काम में लाते हैं लुप्त मोम की शैली की तरह है ढोकला शैली है जो झारखंड के कई क्षेत्रों में आज भी प्रचलित है।
झारखंड में मूर्तियों आदि प्राचीन काल से ही बनाई जाती है अधिकांश मूर्तियां धार्मिक दृष्टिकोण से बनती है तथा कुछ सजावटी के सामान के रूप में मूर्तियों को बनाने में धोकड़ा शैली का भी प्रयोग किया जाता है

बांस शिल्प
बांस शिल्प का काम प्रमुखता महली, संथाल, हो, गोंड, पहाड़िया आदि जनजातियों द्वारा किया जाता है बांस के वस्तुओं से निर्माण में दाब और एक छोटी छोरी का प्रयोग किया जाता है।

कंब कट शैली
उराव घरों में लता, पुष्प तथा पूर्वज के गण चीन को चित्रित किया जाता है कोहबर चित्रकारी में उरांव जनजाति कम कट कला का प्रयोग करते हैं कोहबर चित्रों में रंगों का अभाव दिखता है कोहबर चित्र में अभिकालपों का निस्पन्  कंघी के माध्यम से किया जाता है जिसे कंभ कट कला कहते हैं।


झारखंड के जनजातियों के त्योहारों में भी भिन्न-भिन्न रंग देखने को मिलता है

कर्म पूजा
यह पूजा झारखंड में सर्वाधिक लोकप्रिय है या पर बहनें अपने भाइयों के सुख समृद्धि के लिए करती है इसमें कर्म वृक्ष का विशेष महत्व है कर्म पर्व से 7 दिन पहले बहने नदी से स्वच्छ बालू एक टोकरी में लाती है उसमें सात प्रकार के अनाज जाऊं, मकई, गेहूं, उड़द, कुर्ती, चना, मटर आदि बोया जाता है इसे जूता जगता कहते हैं।कर्म पूजा के दिन भाई उपवास करता है और कर्म वृक्ष की तीन पूर्ण डाली काट कर लाता है या काम आंकड़ा के लिए पहन करता है घर के आंगन और आंकड़ा के इस डाल को गाढ़ा जाता है बहने पूजन सामग्री के साथ कर्म डाली के चारों और बैठती है गांव के बड़े-बड़े पांसे कर्म की कथा सुनते हैं इस कथा में कर्मा धर्मा और कर्म रानी की कथा होती है उरांव जनजाति में कर्म के कई रूप है जैसे राजी कडरू जीतिया अंधारी सोहराई कर्म । कर्म के दूसरे दिन करम राजा या गोसाई या दव को घर-घर पूजा विधि कर नदी तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है फिर जाता वितरित किया जाता है।

सरहुल पूजा
जनजातियों का प्रमुख त्यौहार जनजातियों में इसके अलग-अलग नाम है जैसे मुंडा जनजाति में इसे सरहुल बोला जाता है, उरांव जनजाति में खड्डी बोला जाता है, संथाल जनजाति में   बा पर्व बोला जाता है, खड़िया जनजाति में जकोर और बोला जाता है।
सरहुल प्रकृतिक से संबंधित त्यौहार है सरहुल पर्व चैत माह के शुक्ल पक्ष को मनाया जाता है इस पर्व में साल वृक्ष की पूजा की जाती है जनजातियों की या धारणा है कि साल वृक्ष में बोंगा निवास करते हैं या पूजा चार दिनों तक चलती है।
पहला दिन मछली से अभिशिक्त जल का घर आंगन में छिड़काव किया जाता है। दूसरा दिन उपवास किया जाता है और पहन द्वारा नव पल्लव को सूप में लेकर घर घर के दरवाजे लगाया जाता है। तीसरा दिन सरई फूल को सरना में प्रतिस्थापित किया जाता है और देवी देवताओं की पूजा की जाती है इसमें मुर्गियों की बलि दी जाती है इसके बाद साड़ी चावल एवं बलि चढ़ाई गई मुर्गियों की मां से मिली खिचड़ी प्रसाद के रूप में वितरित की जाती है रात होने पर अखड़ा में नृत्य किया जाता है। चौथा दिन सरई फूल का विसर्जन किया जाता है विसर्जन स्थल को गीडवा कहा जाता है।

मांडा पर्व
वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आरंभ होता है महादेव की पूजा होती है आदिवासी और सदान दोनों में समान रूप से प्रचलित है यह पर्व उपवास और पर्व की विधि उपवास रखने वाले पुरुष वर्ती को भक्ता उपवास रखने वाली महिला वर्ती को सोख तायन कहा जाता है। जागरण की रात भक्तों को धूप धवन की अग्निशिखा के ऊपर उल्टा लटका कर जलाया जाता है इस क्रिया को धोनंसी कहते हैं। फिर दहकते अंगारों पर उन्हें चलना होता है जिसे फुल खुंदी कहा जाता है। इसी दिन  भक्ति  लोग चड़क डांस में झूमते हैं। झारखंड में या महादेव की सबसे कठिन पूजा है कहीं-कहीं तो इनकी पीठ पर लोहे के बने हुए अंकुश से छेद किया जाता है।

धान बुनी पर्व
मांडा पर्व के दिन मनाया जाता है इस पर्व में किसान नई धोती धारण कर खेत की जुताई करता है तथा बांस की नई टोकरी में धान लेकर बोता है 1या 2 मुड़ी लेकर शुभ मुहूर्त में धान बुवाई का शुभारंभ किया जाता है।

अषाढ़ी पूजा
इस पर्व में घर आंगन में बकरी की बलि दी जाती है तथा हरिया का तपा चढ़ाया जाता है मान्यता है कि इस पर्व को मनाने से गांव में चेचक जैसी महामारी पास नहीं भटकती।

सावनी पूजा
सावन माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाया जाता है देवी की पूजा में बकरी की बलि और हरिया का तपान चढ़ाया जाता है।

कादलेटा पर्व
भादो महीने में करमा पर्व से पहले मनाया जाता है या मेड की भूत को शांत करने के लिए मनाया जाता है। पाहन हरिया उतार कर पूरे गांव से चावल लेता है अखड़ा में बेलवा, साल, केंद्र की डालियां रखकर पूजा की जाती है मुर्गे की बलि दी जाती है जो बाद में प्रसाद के रूप में सभी को वितरित किया जाता है पूजा के बाद आंकड़ा से डालियों को लेकर लोग अपने अपने खेतों पर गढ़ते हैं मान्यता है कि ऐसा करने से फसल रोग मुक्त रहती है।

बहुरा (राइज बहरलक) पर्व
भादो माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है अच्छी वर्षा एवं संतान प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा मनाया जाता है।

नवाखानी पर्व
कर्मा के बाद नया अन खाना ही नवा खानी पर्व के नाम से जाना जाता है। देवता को दही चूड़ा चढ़ाया जाता है घर आए मेहमानों को दही चूड़ा खिलाया जाता है।

सोहराय पर्व
यह मवेशियों और देवता पशुपति की पूजा का त्यौहार है कार्तिक माह की अमावस्या को मनाया जाने वाला पर्व है या दंत कथाओं के अनुसार इसे धरती मां की पुत्री विंदी के लौटने का प्रतीक माना जाता है जिसे मौत के मुंह से वापस लाया गया या पर 5 दिनों तक चलता है।

सर्याही पूजा
अगहन माह में मनाया जाता है सफेद मुर्गे की बलि दी जाती है और हरिया चढ़ाया जाता है इस पूजा में सिर्फ पुरुष भाग लेते हैं।

पूस पर्व
यह त्यौहार सूर्यपूजा से संबंधित है मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है कुर्मी समुदाय में ज्यादा प्रचलित है।

मागे पर्व
या माघ माह में मनाया जाता है इस दिन कृषि मजदूर की अवधि पूरी होती है इस दिन कृषि वर्ष का अंत होता है तथा नए कृषि वर्ष का आरंभ होता है।

चंडी पर्व
या पर माघ महीने की पूर्णिमा को उरांव जनजाति के द्वारा बनाया जाता है।

फगुआ पर्व
यह होली का झारखंडी पर्व है यह फागुन की अंतिम पूर्णिमा एवं चैत के प्रथम दिवस का त्यौहार है।

देसावली पर्व
यह पेज पर पर्व देव भूत की पूजा है या 12 वर्षों में एक बार आता है इस पर में भैंस की बलि दी जाती है।

जितिया पर्व
यह हिंदुओं का पर्व है जो आदिवासियों में भी मनाया जाता है अश्विन मास में कृष्ण पक्ष अष्टमी को माताएं अपने पुत्र की सुख समृद्धि तथा दीर्घ जीवन के लिए जितिया करती है।

देव उतान पर्व
कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्थी के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व है घर की महिलाएं घर आंगन को साफ कर अल्पना बनाती है घर की महिलाएं काल्पनिक देवी देवताओं की तस्वीरें चावल की कुंड ई के घोल से बनाती है पुरुष सदस्य देव पुरखों की पूजा कर धूप चावल जलाकर पीढ़ियां चौकी पर देव को बिठाते हैं प्रसाद चढ़ाया जाता है पांच बार चौकी सफेद देव को उठाया जाता है युवा शादी इस देव उत्थान से पूर्व वर्जित रहता है।

और भी पर्व है जैसे कि भाक कतेक, चांद बरेक, पटो सरना,फूटी दहन पूजा,बंदना पर्व इत्यादि।

जनजातियों में आज भी यह सभ्यता मौजूद है और कई सभ्यता ऐसी है जो नई पीढ़ी के साथ विलुप्त होते जा रही है जिसे हमें संभालना चाहिए क्योंकि यही सभ्यता है जो हमें जीने का मकसद देती है और हमें अपनी जड़ से जोड़े रखती है।

प्रस्तुत पंक्ति में यदि कोई गलती हो गई हो तो उसके लिए मैं आप सभी  से माफी चाहता हूं। धन्यवाद

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