फिलीपींस की नूरा शिवा उद्योगिक नगरी जमशेदपुर में नूरा माँ के नाम से है मशहूर- सब्जी बेच कर चिल्ड्रेन होम चलाती है नूरा

Shah Ahmad
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साइकिल से घूमकर हर सुबह सब्जी बेचना और इस पैसे से 33 गरीब व अनाथ बच्चों का भरण पोषण करना, यही नूरा की जिंदगी का अब मकसद बन गया है। फिलीपींस से रहने के लिए भारत आयी है नूरा। बच्चे प्यार से नूरा मां कहकर बुलाते हैं। वैसे पूरा नाम नूरा शिवा है। वर्ष 2009 से सेवा का यह सिलसिला जारी है।

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नूरा शिवा की कहानी बेहद दिलचस्प और प्रेरक है। पूर्वी सिंहभूम जिले के जमशेदपुर के बिरसानगर निवासी एमके शिवा कोरिया में सैमसंग कंपनी में काम करते थे। वहीं पर पहले से फिलीपींस की नूरा भी काम करती थीं। वर्ष 1996 में दोनों की आंखें चार हुईं। फिर एक-दूजे को होकर रह गए। वहां से दोनों फिलीपींस गए। परिणय सूत्र में बंधकर वापस भारत लौट आए। भारत आने पर एमके शिवा पिता के बिरसानगर स्थित आवास में रहने लगे। पिछले छह माह से रोजगार की तलाश में एमके शिवा दिल्ली में घूम रहे हैं।

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चिल्ड्रेन होम चलाने लगीं नूरा:

इधर, खुद को व्यस्त रखने के लिए नूरा ने शादी के 13 वर्ष बाद शिवा एजुकेशन एंड वेलफेयर सोसायटी बना कर चिल्ड्रेन होम चलाने लगीं। बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने लगीं। उम्मीद थी कि कहीं से कोई मदद मिल जाएगी पर, ऐसा नहीं हुआ। इधर, बच्चों की संख्या बढ़ती गई। नूरा चाहकर इन बच्चों से दूर नहीं होना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने चिल्ड्रेन होम आबाद रखने के लिए सब्जी बेचना शुरू कर दिया। हर सुबह साइकिल से घूम कर सब्जी बेचती हैं। कुछ बड़े बच्चे उनकी मदद भी करते हैं।

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बच्‍चों के प्‍यार में सब भुला दिया:

नूरा कहती हैं कि बच्चों के लाड-प्यार ने सब कुछ भुला दिया है। घर-द्वार, अपना देश व अपनों को भूलकर अब इन्हीं बच्चों की मां बनकर रह गई हूं। मुझे सिर्फ इन्हीं की चिंता रहती है। कौन खाया, कौन सोया, कौन पढ़ रहा है, इसी में समय बीत जाता है। नूरा बताती हैं कि उनके चिल्ड्रेन होम में घाटशिला, पोटका, कांड्रा समेत सुदूर गांवों के आदिवासी बच्चे रहते हैं। गरीबी व अभाव के कारण परिजन ने इन्हें पालने के लिए यहां पहुंचा रखा है।

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भोजन, पढ़ाई और आवास सबकुछ निश्शुल्क: 

नूरा के इस चिल्ड्रेन होम में रह रहे बच्चों के लिए सबकुछ निश्शुल्क है। आवास और भोजन के साथ शिक्षा-दीक्षा तक। यहां के बच्चे पड़ोस के टिनप्लेट क्रिश्चियन मिडिल स्कूल में पढऩे जाते हैं। नूरा उन्हें समय पर स्कूल भेजती हैं। उनके भोजन का भी प्रबंध करती हैं।

बच्‍चे बड़े होकर बनें नेक इंसान:

किसी तरह की सरकारी मदद नहीं मिलती है। घर पर सिलाई-कढ़ाई व सब्जी बेचकर बच्चों की आवश्यकताएं पूरी करती हूं। पति इस कार्य में भरपूर सहयोग करते हैं। उनके सपोर्ट ही मुझे बल मिलता है। इच्छा है कि बच्चे बड़े होकर नेक इंसान बनें।

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