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Shibu Soren Biography: झारखंड के जनक “गुरुजी” बनने की कहानी, पढ़े शिबू सोरेन की जीवनगाथा

Shibu Soren Biography: ‘समर शेष है’ और ‘रेड जोन’ उपन्यासों के लेखक और एक्टिविस्ट पत्रकार विनोद कुमार बताते हैं- हेमंत के दादा शोबरन मांझी गोला प्रखंड के नेमरा इलाके के गिने-चुने पढ़े लिखे युवाओं में से एक और पेशे से शिक्षक थे। उनका राजनीति में भी  दखल था, लेकिन महाजनों- सूदखोरों से उनकी नहीं पटती थी।

उस दौर में शोषण का एक आम तरीका यह था कि महाजन जरूरत पड़ने पर सूद पर धान देते और फसल कटने पर डेढ़ गुना वसूलते। इसे न चुकाने पर से खेत नाम करवा लेते और उसी से उस जमीन पर बेगार करवाते। एक बार उन्होंने एक महाजन को सरेआम पीटा भी था और इसलिए वे उनकी आंख की किरकिरी बन गए। 

उन दिनों शिबू गोला के एक स्कूल में पढ़ते थे और वहीं होस्टल में अपने भाई राजाराम के साथ रहते थे। 27 नवंबर 1957 को शोबरन शिबू के लिए राशन पहुंचाने जा रहे थे, तभी घात लगाकर जंगल में उनकी हत्या कर दी गई। शिबू की मां सोनामणि जीवट महिला थी। उन्होंने बहुत दिनों तक अपराधियों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट के चक्कर काटे और बच्चों को अपने बलबूते पाला। कोर्ट की तारीखों पर वे बच्चों को लेकर जाया करती थीं।एक दिन इस संकल्प के साथ लौटीं कि अपने पिता के हत्यारों के साथ उनके बच्चे ही इंसाफ करेंगे।

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शिबू ने भी उनके संघर्ष को आगे बढ़ाया। लकड़ी बेचकर परिवार पाला। महाजन प्रथा के खिलाफ ‘धनकटनी आंदोलन’ चलाया। संथालों ने उन्हें दिशोम गुरु यानी ‘दसों दिशाओं का गुरु’ नाम दिया। तभी से शिबू गुरुजी के नाम से पहचाने जाने लगे। शिबू ने 4 फरवरी 1973 को झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया और अलग राज्य के लिए संघर्ष किया। 1980 में जब पहली बार शिबू सांसद का चुनाव लड़े। तब वे और उनके समर्थक साइकिल पर झोले में लाल मिट्टी और नील रखकर गांव-गांव प्रचार करते और दीवारों पर आदिवासी एकता और समर्थन के नारे लिखते थे। 2000 में झारखंड अस्तित्व में आया तो शिबू का कद बढ़ गया।  शिबू राज्य के पहले नेता हैं, जो खुद तीन बार सीएम बने और बेटे हेमंत को दो बार इस पद तक पहुंचाया।

Shibu Soren Biography: शिबू सोरन ने अपना पूरा जीवन झारखंड के नाम कर दिया, कई यातनाएं भी सहन करनी पड़ी

झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन ने अपना पूरा जीवन झारखंडियों के उत्थान के लिए लगा दिया. वैसे तो झारखंड का सपना लिए कई आंदोलनकारी शहीद भी हुए. कई विभिन्न प्रकार की यातनाएं भी सहे. इन्हीं में से एक हैं आदिवासी नेता शिबू सोरेन. अब इन्हें दिशोम गुरु के नाम से भी जाना जाता है. संताली में दिशोम गुरु का मतलब होता है देश का नेता. आज दिशोम गुरु के नाम से सभी जानते हैं. इन्होंने वर्षों जंगलों की खाक छानी. कई बार जेल गये और तब तक आंदोलन करते रहे, जब तक महाजनी व सूदखोरी प्रथा को खत्म नहीं किया और झारखंड अलग राज्य को एक नयी दिशा नहीं दी. शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी, 1944 को तत्कालीन बिहार के हजारीबाग जिला अंतर्गत नेमरा में हुआ था, जो वर्तमान में झारखंड के रामगढ़ जिला अंतर्गत है. झारखंड अलग राज्य के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन राज्य के मुखिया के तौर पर 3 बार कमान संभाल चुके हैं. केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं. वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं. वहीं, इनके पत्र हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड का कमान संभाल रहे है.

1970 के दशक में झारखंड (तब बिहार ) की राजनीतिक नक्शे में शिबू सोरेन का उदय हुआ था. शिबू सोरेन से पहले उनके पिता सोबरन सोरेन भी महाजनी प्रथा, सूदखोरी और शराबबंदी के खिलाफ जोरदार आंदोलन चलाये थे. पिता की हत्या के बाद शिबू सोरेन गोला क्षेत्र से बाहर निकले और पिता के अधूरे कार्य को पूरा करने का बीड़ा उठाया. इस वक्त शिबू सोरेन युवा थे. इस कारण युवा समेत अन्य लोगों को शराब से दूर रखने के साथ-साथ महाजनी प्रथा व सूदखोरी पर लगाम लगाने का अभियान छेड़ा. 

टुंडी प्रखंड के पलमा से शिबू सोरेन ने महाजनों और सूदखोरों के खिलाफ अपना आंदोलन शुरू किया था. संताल समाज को जागरूक करने और लोगों को शिक्षित करने के लिए सोनोत संताल समाज का गठन किया. इसी दौरान उन्होंने महाजनों की जमीन पर धान काटो अभियान भी शुरू किया था. इसके बाद से शिबू सोरेन कभी पीछे मुड़कर नहीं देखे. शिबू सोरेन ने पलमा में अपना आश्रम भी खोले थे.

Shibu Soren Biography: ‘झारखंड आन्दोलन का दस्तावेज : शोषण, संघर्ष और शहादत’ में शिबू सोरेन के शुरुआती दौर से लेकर अब तक के कार्यों का विस्तार से चर्चा है.

एके राय, विनोद बिहारी महतो और शिबू सोरेन अलग-अलग बैनर के तले आंदोलन चला रहे थे.  4 फरवरी, 1972 को तीनों एक साथ बैठे और सोनोत संताल समाज और शिवाजी समाज का विलय कर ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ नामक नया संगठन बनाने का निर्णय हुआ. इसके बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ. झामुमो के गठन के साथ ही विनोद बिहारी महतो इसके पहले अध्यक्ष बने थे, तो शिबू सोरेन को महासचिव बनाया गया था.

गुरुजी ने धनबाद, हजारीबाग, गिरिडीह जैसे इलाकों में महाजनों के खिलाफ आंदोलन छेड़ था. सामूहिक खेती, सामूहिक पशुपालन और रात्रि पाठशाला के जरिये रचनात्मक काम भी शुरू किये थे. इसी दौरान धान काटो अभियान भी तेजी से शुरू हुआ. शिबू सोरेन के निर्देश पर आदिवासी महिलाएं खेतों में उतर गयीं. धान काटना शुरू

हुआ. आदिवासी पुरुष खेतों के बाहर तीर-धनुष लेकर पहरा देते और आदिवासी महिलाएं धान काटती थी. इसको लेकर कुछ स्थानों पर महाजन और पुलिस के साथ आंदोलनकारियों का संघर्ष भी हुआ. इस संघर्ष में कई लोग शहीद भी हुए. विभिन्न थानों में शिबू सोरेन पर मामला भी दर्ज हुआ था. इस दौरान गिरफ्तारी से बचने के लिए शिबू सोरेन ने गिरिडीह जिले के पारसनाथ की पहाड़ी पर शरण लिये और यहीं से आंदोलन का संचालन भी किया था. 

इसी बीच कांग्रेसी नेता ज्ञानरंजन और धनबाद के तत्कालीन डीसी केबी सक्सेना के सहयोग से बोकारो एयरपोर्ट पर शिबू सोरेन ने सरेंडर किया था. हालांकि, 2 महीने ही जेल से बाहर भी निकल गये. गुरुजी ने राजनीति की ओर रूख किया. लोकसभा और उसके बाद वर्ष 1977 में टुंडी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव में खड़े हुए, लेकिन दोनों चुनाव में हार मिली. इसके एक साल बाद वर्ष 1978 में शिबू सोरेन ने संताल परगना की ओर रूख किये. गरुजी ने यहां की आदिवासियों की भमि को महाजनों और साहूकारों के चंगुल से मुक्त कराया. संताल परगना की ओर रूख करने के साथ ही गुरुजी ने इस क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बनाया. वर्ष 1980 के मध्यावधि चुनाव में दुमका (सुरक्षित) लोकसभा चुनाव में उनकी जीत हुई और JMM के पहले सांसद बने. वहीं, 1980 के विधानसभा चुनाव में संताल परगना के 18 में से 9 सीटों पर JMM की जीत हुई. इस जीत ने बिहार की राजनीति में भूचाल दिया. 1984 के लोकसभा चुनाव में गुरुजी को कांग्रेस के पृथ्वीचंद्र किस्कू से हार मिली, लेकिन वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में झामुमो ने एक बार फिर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. इसके बाद 1986, 1989, 1991 और 1996 के लोकसभा चुनाव में इनकी जीत हुई. इसके बाद वर्ष 2002 में राज्यसभा के लिए चुने गये. वहीं, वर्ष 2004 में दुमका से लोकसभा के लिए चुने गये.

वर्ष 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार में वे केंद्रीय कोयला मंत्री बने. लेकिन, इस पद पर गुरुजी अधिक दिनों तक नहीं रह पाये. चिरुडीह हत्याकांड में गुरुजी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट आने के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रीमंडल से 24 जुलाई, 2004 को इस्तीफा देना पड़ा था. बता दें कि वर्ष 1975 में जामताड़ा के चिरुडीह में ‘बाहरी’ लोगों (आदिवासी में इन्हें ‘दिकू’ कहा जाता है) के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था. 23 जनवरी, 1975 में बाहरी लोगों को खदेड़ने के लिए आंदोलन छेड़ा गया था, लेकिन आंदोलन हिंसक रूप ले लिया. इस हिंसा में 11 लोगों की मौत हो गयी थी. इस मामले को लेकर गुरुजी समेत 68 लोगों को आरोपी बनाया गया था. यह हत्याकांड वर्षों तक सुर्खियों में रहा. इसी मामले में कोर्ट से गिरफ्तारी वारंट जारी होने के कारण गुरुजी को कोयला मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

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Hemant Soren and Shibu Soren

झारखंड के 3 बार मुख्यमंत्री बने गुरुजी। 15 नवंबर, 2000 को बिहार से झारखंड अलग राज्य बना. इस राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी थे, लेकिन गुरुजी ने इस राज्य की बागडोर 3 बार संभाली. गुरुजी ने पहली बार वर्ष 2005 में झारखंड के तीसरे मुख्यमंत्री बने. मात्र 10 दिन के लिए सीएम बने. इनका कार्यकाल 2 मार्च, 2005 से लेकर 11 मार्च, 2005 तक रहा. इसके बाद दूसरी बार उन्होंने वर्ष 2008 में मुख्यमंत्री बने. इस दौरान इनका कार्यकाल 27 अगस्त, 2008 से 12 जनवरी, 2009 तक रहा. वहीं, तीसरी बार वर्ष 2009 में सीएम बने. इस दौरान इनका कार्यकाल 30 दिसंबर, 2009 से 31 मई, 2010 तक रहा. यह सरकार 5 महीने ही चली. तीसरी बार सीएम बनने के दौरान शिब सोरेन लोकसभा के सांसद भी थे. भाजपा के सहयोग से सरकार बनाये शिबू सोरेन ने संसद में यूपीए को वोट कर दिया. इससे नाराज भाजपा ने झामुमो से नाता तोड़ लिया. इससे शिबू सोरेन की सरकार गिर गयी.

27 अगस्त, 2008 को मधु कोड़ा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था. इसके बाद जेएमएम सुप्रीमो शिबू सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री बने. हालांकि, संवैधानिक प्रावधान के मुताबिक, 6 माह के अंदर विधानसभा का सदस्य बनना था. इसी बीच तमाड़ विधानसभा क्षेत्र के जेडीयू विधायक रमेश सिंह मुंडा की हत्या के बाद यहां उपचुनाव हुआ था. सीएम रहते शिबू सोरेन ने वर्ष 2009 के उपचुनाव तमाड़ विधानसभा सीट से चुनाव लड़े. लेकिन, झारखंड पार्टी के राजा पीटर से चुनाव हार गये और मुख्यमंत्री पद को छोड़ना पड़ा. वर्तमान में शिबू सोरेन झारखंड से राज्यसभा के सांसद हैं.

शिबू सोरेन के पुत्र झारखंड के मुख्यमंत्री गुरुजी शिबू सोरेन ने अपने शुरुआती दिनों में जिस महाजनी प्रथा व सूदखोरी से राज्य को मुक्ति दिलाने का सपना संजोये थे. वो पूरा हुआ. अलग राज्य बना और 20 साल के सफर ने कई उतार- चढ़ाव भी देखे. कभी गुरुजी ने राज्य की कमान संभाले, तो कभी संसद में राज्य के विकास की बात रखी. अब उनके पुत्र हेमंत सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री हैं. गुरुजी के 3 पुत्र और एक पुत्री है. बड़े पुत्र दुर्गा सोरेन का निधन हो गया है, जबकि दूसरे पुत्र हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं और छोटे पुत्र बसंत सोरेन दुमका से विधायक हैं. जबकि बेटी अंजनी सोरेन ओडिशा में पार्टी की कमान संभाल रही है.

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