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कांग्रेस शुरुआत से कठोर फैसले लेने में रही है कमजोर, पढ़िए अजीज मुबारकी का लेख

News Desk
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कांग्रेस पार्टी में केंद्रीय नेतृत्व को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हुई है. कांग्रेस दावा करती है कि बीजेपी एक साम्प्रदायिक पार्टी है लेकिन कांग्रेस अपने शासनकाल में हुए दंगो को रोकने में असफलता के कारणों कि चर्चा नहीं करती है. राजनितिक मामलो के जानकार अजीज मुबारकी ने कांग्रेस के राजनितिक पतन के कारण को इस लेख में बताया है.

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2014 की लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अप्रिय या प्रतिकारक हार के बाद, कांग्रेस ने एके एंटनी समिति के साथ एक आंतरिक सर्वेक्षण किया. एंटनी कमिटी का गठन 2014 में पार्टी की हार के कारणों पर ध्यान देने के लिए निर्धारित किया गया था. समिति द्वारा यह पाया गया कि उन्हें (कांग्रेस को) एक ऐसी पार्टी के रुप में दिखाया गया जो मुस्लिममानों का समर्थन करता है और हिन्दू विरोधी है. और यही चुनावी उलटफेर का एक मुख्य कारण बना.

कांग्रेस भले ही अपनी आतंरिक सर्वे में यह बता रही हो कि हार का कारण धार्मिक और साम्प्रदायिक है. लेकिन कांग्रेस अपनी असली गलती को स्वीकार नहीं करना चाहती है. शरद पवार, ममता या यहां तक ​​कि येदुगुरी संदीप्ति जगनमोहन रेड्डी को क्यों छोड़ना पड़ा या कैसे-कैसे सफलतापूर्वक उन्होंने अपने स्वयं के राजनीतिक संगठन का शुभारंभ किया और अपने राज्यों पर शासन किया? प्रणब मुखर्जी, दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल या यहां तक ​​कि खुद एंथनी जैसे प्रमुख नेता INC को बचाने या अपने गृह राज्यों में इसे पुनर्जीवित करने में विफल रहे?

रिपोर्ट में गुजरात, असम, अरुणाचल, मध्य प्रदेश में विधायको के बातो को नजर अंदाज़ किया गया साथ ही उनपर पार्टी कि निगाह नहीं रही और ऐसा लगने लगा है कि झारखंड में भी कुछ ऐसा ही होने वाला है. एंथनी की समिति वास्तविक कारणों को बताने में विफल रही. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट या मध्य प्रदेश में कमलनाथ बनाम सिंधिया के बीच कि राजनितिक वर्चस्व को देखने में नाकाम रही? कांग्रेस के साथ वर्तमान में जो कुछ भी हो रहा है वह दर्शाता है कि पार्टी और सरकार पर नियंत्रण करने का परिणाम है.

कांग्रेस कि विफलताओ पर अजीज मुबारकी कहते है कि मैं अप्रैल 1987 के हाशिमपुर नरसंहार को याद दिला सकता हूँ जहाँ पीएसी पलटन ने मेरठ के हाशिमपुर मुहल्ले में मुस्लिमों को गोलबंद किया, गिरफ्तार किया और कथित रूप से गाजियाबाद जिले के मुराद नगर में ऊपरी गंगा नहर में एक ट्रक में समुदाय के 50 लोगों को ले जाने के बजाय उन्हें थाने ले जाकर एक एक करके गोली मार दी। और नहर में फेंक दिया। और यह कांग्रेस सरकार के तहत वीर बहादुर सिंह के नेतृत्व में हुआ, उस पर कोई कार्रवाई करने के बजाय, उन्हें अगले साल 1988 में राजीव गांधी के केंद्रीय संचार मंत्री बना दिया गया.

बाहुबलियों के लिए कांग्रेस के प्यार का एक और उदाहरण भागलपुर से आता है, जहां दंगे 24 अक्टूबर 1989 को शुरू हुए, लेकिन 2 महीने तक जारी रहे। इसने भागलपुर शहर और इसके आसपास के 250 गांवों को प्रभावित किया। 1,000 से अधिक लोग (जिनमें से लगभग 900 मुस्लिम थे) मारे गए थे, और अन्य 50,000 लोग मारे गए थे। यह गोधरा कांड से पहले स्वतंत्र भारत में सबसे खराब सांप्रदायिक दंगा के रूप में दर्ज किया गया था। यह आरोप लगाया जाता है कि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़का रहे थे और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा द्वारा उसी दिन अजीत दत्त को प्रभार सौंपने के लिए कहा गया था। लेकिन, दंगा प्रभावित क्षेत्र के दौरे पर, तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने स्थानांतरण को रद्द कर दिया.

1961 के बाद से लगभग 60 बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए हैं, और उनमें से अधिकांश कांग्रेस के शासन वाले राज्यों में थे। लेकिन जिस प्रकार से नरेन्द्र मोदी का विरोध किया गया था उस प्रकार कांग्रेस के किसी भी मुख्यमंत्री के खिलाफ विरोध प्रदर्शन नहीं किया गया था. वक्त रहते अगर कांग्रेस का आला कमान अपने मुख्यमंत्रियों और नेताओ पर कारवाई करता तो आज कांग्रेस को पक्षपात का सामना न करना पड़ता.

1984 में जो हुआ वह एक शुरुआत थी जहां एक विशेष राजनीतिक दल के सदस्यों / कैडरों ने इंदिरा गांधी की हत्या के लिए कथित जवाबी कार्रवाई में सिख समुदाय पर हमलों का नेतृत्व किया। यह बताना अनिवार्य है कि 1984 सांप्रदायिक दंगों की श्रेणी में नहीं आता है क्योंकि यह समुदायों के बीच नहीं था, यह एक समुदाय पर एक राजनीतिक दल के कैडरों द्वारा किया गया सीधा हमला था। हालांकि 2002 अधिक घातक था क्योंकि यह एक तात्कालिक और तकनीकी रूप से बड़ा हमला था, लेकिन तब भी केवल भाजपा को दोषी नहीं ठहराया नहीं जा सकता है क्यूंकि इससे कांग्रेस जैसी बड़ी और पुरानी पार्टी की अत्याचारी क्षमताओं को कम करके आंकेंगी। हालाकिं कांग्रेस वैचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है. कांग्रेस ने कभी कठोर फैसले नहीं लिए. कभी भी कांग्रेस द्वारा शासित राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की जांच के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है।

इतिहास को देखते हुए कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष शासन प्रदान करने के झूठे दावे, कांग्रेस सांप्रदायिक दंगों को रोकने में भाजपा की तुलना में बेहतर नहीं है। और अब जब हर कोई जो कांग्रेस में है, वह राम लल्ला के लिए कड़ी मेहनत का दावा करने की कोशिश कर रहा है. कांग्रेस अब एक भ्रमित पार्टी की तरह दिखते हैं! मैं ऐसी उम्मीद करता हूँ कि कांग्रेस असली कारण ढूंढेगे कि कांग्रेस क्यों बनी और अब 150 साल के बाद कयामत के कगार पर क्यों है?

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