Ranchi News : रांची नगर निगम ने अपर बाजार की 608 दुकानों को खाली करने का नोटिस जारी किया है। प्रस्तावित बहुमंजिला भवन निर्माण योजना के बीच 10 हजार से अधिक लोगों के रोजगार पर संकट मंडरा रहा है। व्यापारियों ने सरकार से हस्तक्षेप और पुनर्वास की मांग की है।
Ranchi News : झारखंड की राजधानी रांची का अपर बाजार राज्य का सबसे बड़ा और सबसे पुराना व्यावसायिक केंद्र माना जाता है। यहां रोजाना हजारों व्यापारी और ग्राहक कारोबार के लिए पहुंचते हैं। लेकिन अब इसी व्यापारिक केंद्र पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। रांची नगर निगम द्वारा अपर बाजार की 608 दुकानों को खाली करने का नोटिस जारी किए जाने के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। व्यापारियों का कहना है कि यदि यह कार्रवाई बिना ठोस पुनर्वास योजना के लागू की गई तो 10 हजार से अधिक लोगों का रोजगार प्रभावित होगा और हजारों परिवारों की आजीविका संकट में पड़ जाएगी।
नगर निगम की ओर से जारी नोटिस के अनुसार, जिस स्थान पर वर्तमान में दुकानें संचालित हो रही हैं, वहां भविष्य में बहुमंजिला व्यावसायिक भवन (मल्टीस्टोरी बिल्डिंग) का निर्माण प्रस्तावित है। निगम का कहना है कि इससे बाजार का आधुनिक विकास होगा और भविष्य में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी। हालांकि व्यापारी इस योजना का विरोध कर रहे हैं और उनका कहना है कि विकास के नाम पर उन्हें उजाड़ा जा रहा है।
व्यापारियों का आरोप है कि रांची नगर निगम वर्षों से इस क्षेत्र से टैक्स और अन्य शुल्क की वसूली करता रहा है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के नाम पर कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई। अपर बाजार में हर वर्ष बारिश के दौरान जलजमाव की गंभीर समस्या उत्पन्न होती है। सड़कें पानी में डूब जाती हैं, जिससे व्यापार प्रभावित होता है और ग्राहकों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। व्यापारियों का कहना है कि जब नगर निगम वर्षों तक जल निकासी, सड़क, पार्किंग और अन्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा सका, तो अब अचानक दुकानों को खाली कराने का आदेश उचित नहीं माना जा सकता।
रांची नगर निगम किरायेदार संघ के अध्यक्ष मुकेश अग्रवाल ने बताया कि अपर बाजार में वर्ष 1940 से व्यापारिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। उनके अनुसार, उस समय व्यापारियों को जमीन उपलब्ध कराई गई थी, जिसके बाद लोगों ने अपनी क्षमता के अनुसार दुकानें बनाकर कारोबार शुरू किया। आज इन दुकानों में कई परिवारों की तीसरी पीढ़ी व्यापार कर रही है। व्यापारियों का दावा है कि इस जमीन को तत्कालीन रातू महाराज द्वारा व्यापारियों को बसाने के उद्देश्य से नगर निगम को उपलब्ध कराया गया था। हालांकि इतने पुराने दस्तावेज अब आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है।
व्यापारियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि मौजूदा दुकानों को तोड़कर बहुमंजिला भवन बनाया जाता है, तो यह सुनिश्चित नहीं है कि वर्तमान दुकानदारों को दोबारा वहीं दुकानें आवंटित की जाएंगी। उनका कहना है कि निर्माण कार्य पूरा होने में पांच से सात वर्ष तक का समय लग सकता है। ऐसे में इतने लंबे समय तक वे अपना व्यवसाय कहां से चलाएंगे और अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे करेंगे, इसका कोई स्पष्ट जवाब नगर निगम के पास नहीं है।
व्यापारियों के अनुसार, निगम के अधिकारियों द्वारा केवल इतना कहा जा रहा है कि वे स्वयं वैकल्पिक व्यवस्था कर लें। लेकिन अपर बाजार जैसा व्यापारिक स्थान छोड़कर किसी अन्य जगह दुकान स्थापित करना आसान नहीं है। वर्षों से बना ग्राहक आधार, व्यापारिक पहचान और कारोबार की निरंतरता एक झटके में समाप्त हो सकती है। छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए यह स्थिति आर्थिक रूप से बेहद कठिन साबित हो सकती है।
अपर बाजार में 600 से अधिक दुकानों के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से 10 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। किसी दुकान में दो कर्मचारी कार्यरत हैं तो कहीं 30 से 40 लोगों तक को रोजगार मिलता है। इसके अलावा यहां ठेला लगाने वाले, माल ढुलाई करने वाले मजदूर, रिक्शा चालक, पैकिंग कर्मचारी, चाय-नाश्ते के दुकानदार और अन्य छोटे व्यवसायियों की आजीविका भी इसी बाजार पर निर्भर है। यदि दुकानों को बंद कराया जाता है तो इसका असर केवल दुकानदारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हजारों अन्य परिवार भी आर्थिक संकट का सामना करेंगे।
व्यापारियों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें व्यापारियों और आम लोगों के हितों की भी रक्षा हो। उनका सुझाव है कि यदि बहुमंजिला भवन का निर्माण आवश्यक है, तो पहले सभी प्रभावित दुकानदारों के लिए वैकल्पिक व्यापारिक परिसर तैयार किया जाए। साथ ही यह भी लिखित रूप से सुनिश्चित किया जाए कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद वर्तमान दुकानदारों को प्राथमिकता के आधार पर नई दुकानों का आवंटन किया जाएगा।
इस पूरे मामले के बाद अपर बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। कई व्यापारियों ने सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की है। उनका कहना है कि राज्य सरकार और नगर विकास विभाग को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ताकि विकास कार्य भी आगे बढ़े और हजारों लोगों की रोजी-रोटी भी सुरक्षित रह सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शहरी पुनर्विकास योजना में प्रभावित लोगों के पुनर्वास और आजीविका की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण पहलू होता है। यदि बिना स्पष्ट पुनर्वास नीति के दुकानों को हटाया जाता है तो इससे सामाजिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर व्यापक असर पड़ सकता है। यही कारण है कि व्यापारी चाहते हैं कि नगर निगम पहले विस्तृत पुनर्वास योजना सार्वजनिक करे और उसके बाद ही किसी प्रकार की कार्रवाई आगे बढ़ाई जाए।
फिलहाल रांची के अपर बाजार में व्यापारियों के बीच चिंता और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सभी की निगाहें अब राज्य सरकार और नगर निगम के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि समय रहते व्यापारियों और प्रशासन के बीच सहमति नहीं बनती, तो आने वाले दिनों में यह मुद्दा बड़ा आंदोलन का रूप भी ले सकता है।









