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Sheikh Bhikhari: गांधी जयंती के बीच छुप जाती है झारखंड के योद्धा शेख भिखारी की देश प्रेम की गाथा

zabazshoaib

Sheikh Bhikhari Ranchi: देश के स्वतंत्रता संग्राम में कई वीर योद्धाओं ने अपने जीवन को निछावर किया है. शहीद शेख भिखारी (Sheikh Bhikhari

) उन योद्धाओं में शुमार है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वत्र निछावर किया. देश के लिए उनके बलिदान गौरवमय की गाथा है. परंतु महात्मा गांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के बीच 2 अक्टूबर को जन्मे शेख भिखारी का बलिदान की कहानी को लोग याद नहीं कर पाते हैं. चलिए जानते हैं झारखंड के वीर शेख भिखारी (Sheikh Bhikhari) का संक्षिप्त जीवन परिचय:
शहिद शेख भिखारी (Sheikh Bhikhari) का जन्म 02 अक्टूबर 1819 में झारखंड के राँची जिले के ओरमांझी के “खुदिया लोटवा” गांव में एक बुनकर अंसारी परिवार में हुआ था. शेख भिखारी के पिता का नाम शैख़ बुलन्द था. बचपन से वह अपने खानदानी पेशा, मोटे कपड़े तैयार करना और हाट-बाजार में बेचकर अपने परिवार की परवरिश करते थे़। जब उनकी उम्र 20 वर्ष की हुई तो उन्होंने छोटा नागपुर के महाराज के यहां नौकरी कर ली. परन्तु कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने राजा के दरबार में एक अच्छी मुकाम प्राप्त कर ली, बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उनको अपने यहां दीवान के पद पर रख लिया.शेख भिखारी के जिम्मे में बड़कागढ़ की फौज का भार दे दिया गया.

1856 ई में जब अंगरेजों ने राजा महाराजाओं पर चढ़ाई करने का मनसूबा बनाया तो इसका अंदाजा हिंदुस्तान के राजा-महाराजाओं को होने लगा था. जब इसकी भनक ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को मिली तो उन्होंने अपने वजीर पाण्डे गणपत राय, दीवान शेख भिखारी, टिकैत उमराँव सिंह से मशवरा किया. इन सभी ने अंगरेजों के खिलाफ मोरचा लेने की ठान ली और जगदीशपुर के बाबू कुँवर सिंह से पत्राचार किया. इसी बीच में शेख भिखारी (Sheikh Bhikhari) ने बड़कागढ़ की फौज में रांची एवं चाईबासा के नौजवानों को भरती करना शुरू कर दिया। अचानक अंगरेजों ने 1857 में चढ़ाई कर दी। विरोध में रामगढ़ के रेजिमेंट ने अपने अंगरेज अफसर को मार डाला। नादिर अली हवलदार और रामविजय सिपाही ने रामगढ़ रेजिमेंट छोड़ दिया और जगन्नाथपुर में शेख भिखारी की फौज में मिल गये. इस तरह जंगे आजादी की आग छोटानागपुर में फैल गयी. रांची, चाईबासा, संथाल परगना के जिलों से अंगरेज भाग खड़े हुए.

इसी बीच अंगरेजों की फौज जनरल मैकडोना के नेतृत्व में रामगढ़ पहुंच गयी और चुट्टूपालू के पहाड़ के रास्ते से रांची आने लगे. उनको रोकने के लिए शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह अपनी फौज लेकर चुट्टूपालू पहाड़ी पहुंच गये और अंगरेजों का रास्ता रोक दिया. शेख भिखारी ने चुट्टूपालू की घाटी पार करनेवाला पुल तोड़ दिया और सड़क के पेड़ों को काटकर रास्ता जाम कर दिया. शेख भिखारी की फौज ने अंगरेजों पर गोलियों की बौछार कर अंगरेजों के छक्के छुड़ा दिये। यह लड़ाई कई दिनों तक चली. शेख भिखारी के पास गोलियां खत्म होने लगी तो शेख भिखारी ने अपनी फौज को पत्थर लुढ़काने का हुक्म दिया. इससे अंगरेज फौजी कुचलकर मरने लगे. यह देखकर जनरल मैकडोन ने मुकामी लोगों को मिलाकर चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ने के लिए दूसरे रास्ते की जानकारी ली. फिर उस खुफिया रास्ते से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ गये. अंगरेजों ने शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह को छह जनवरी 1858 को घेर कर गिरफ्तार कर लिया और सात जनवरी 1858 को उसी जगह चुट्टूघाटी पर फौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख भिखारी और उनके साथी टिकैत उमरांव को फांसी का फैसला सुनाया. आठ जनवरी 1858 को शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को चुट्टूपहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गयी.

2 अक्टूबर को महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री से पहले “शहीद शेख भिखरी” का जन्म हुआ था. लेकिन सरकार और जनता उसे नजरंदाज कर देती है. मौजूदा परिस्थितियों में प्रत्येक झारखंडियों को उनके जन्मदिवस पर उन्हें याद करना चाहिए एवं शहादत की गाथा को देश के जन-जन तक पहुंचाना चाहिए. तभी इस झारखंड के वीर बलिदानी को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित हो पाएगा.
हालांकि शहिद शेख भिखारी के उनकी वीरता और बलिदान की कहानी स्थानीय लोगों और रांची शहर के चौराहे पर उनकी मूर्तियों की याद में उकेरी गई है, लेकिन देश के बाकी हिस्सों तथा राष्ट्रीय कथा और आधुनिक इतिहास की किताबों में शेख भिखारी अज्ञात और गुमनाम हैं.

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