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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में झारखंडयों का अप्रतिम योगदान और संघर्ष, जानिए देश की आजादी में झारखंड की गौरव गाथा!

News Desk

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड की जनजातियों का अप्रतिम योगदान रहा है। सन 1857 के प्रथम संग्राम के करीब 100 साल पूर्व से ही झारखंड की जनजातियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह किया था. झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का राजनीतिक अर्थ भी पहली बार 1831 के “कोन विद्रोह” से उजागर हुआ था. उन्होंने कहा कि इस विद्रोह के केंद्र थे रांची, सिंहभूम और पलामू. ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ यह संभवत: पहला विराट आदिवासी आंदोलन था. इस आंदोलन के नेतृत्कर्ता तिलका मांझी थे. इसके अलावे “तमाड़ विद्रोह” , बंडू में “मुंडा विद्रोह” , मानभूम में “भूमिज विद्रोह” आदि विद्रोह सबसे प्रचलित थे. देश की आजादी में झारखंड के महापुरुषों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है.

झारखंड ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान झारखंड को स्थानीय लाभ भी हुआ है. कोयला क्षेत्र में हथियार को छुपाना आसान था. पहली स्वतंत्रता संग्राम (1857) से पूर्व ही झारखंड में संग्राम छिड़ चुकी थी. यहां की जनजातियाँ पहले से ही ब्रिटिश शासन से अपनी भूमि को मुक्त करने के लिए सशस्त्र संघर्ष की एक श्रृंखला में लगी थीं. यहां के झारखंडियों को तिलका मजी (जबरा पहाड़िया), सिद्धू कान्हू, बिरसा मुंडा, काना भगत आदि जैसे दिग्गज आदिवासी नेताओं ने आदिवासी संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. झारखंड में आदिवासी संघर्ष ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी.

बता दें कि सन् 1855 में संथाल के आदिवासी वीर योद्धा सिद्धू और कान्हू का विद्रोह हुआ। इसमें 30-35 हजार आदिवासियों ने भाग लिया। आंदोलन हिंसक रूप ले लिया, अनेक अंग्रेज सैनिक और अधिकारी मारे गए। अंत में पूरे क्षेत्र को सेना से सुपुर्द कर दिया गया। मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। देखते ही गोली मारने का आदेश सेना को दे दिए गया। कत्लेआम हुआ.इसमें 10 हजार आदिवासी मारे गए। रमणिका गुप्ता तथा माता प्रसाद ने इन आंकड़ों की पुष्टि की है इसी तरह सन 1913 में मानगढ़ में हुए आदिवासी आंदोलन में भी 15 सौ आदिवासी शहीद हुए थे. ये आंकड़े बताते हैं कि आदिवासी आंदोलनों में लाखों आदिवासियों की जाने गई.

भारत में सबसे पहले आदिवासियों ने स्वतंत्र आंदोलन सन् 1780 में संथाल परगना में प्रारंभ किया। दो आदिवासी वीरों तिलका और मांझी ने आंदोलन का नेतृत्व किया। यह आंदोलन सन् 1790 तक चला इसे “दामिन विद्रोह”कहते हैं इस विद्रोह से अंग्रेजी हुकूमत तरबतर हो गया था. पकड़ने के लिए मि. क्लीवलैंड कि नेतृत्व में सेना भेजी गई परंतु तिलका ने अपने तीर से क्लीवलैंड के सीने में तीर मार कर जान ले लिया तब अंग्रेजी सैनिकों ने छापामार युद्ध के तहत तिलका को पकड़कर पेड़ से लटका कर फांसी दे दिया. “दलित दस्तक”के अनुसार दिल का स्वतंत्रता आंदोलन का पहला शहीद माना जाना चाहिए परंतु 1857 की क्रांति में शहीद हुए मंगल पांडे को स्वतंत्रता संग्राम का पहला शहीद घोषित कर दिया. जबकि सच्चाई यह है कि मंगल पांडे से 70 साल पहले स्वतंत्रता आंदोलन में तिलका शहीद हुआ था.


बता दें कि सन् 1780 से सन् 1857 तक आदिवासियों ने अनेक स्वतंत्रता आंदोलन किए। सन 1780 का “दामिनी विद्रोह” तिलका मांझी ने चलाया, सन् 1855 का “सिद्धू कान्हू विद्रोह” सन् 1858 से 1832 तक बुधु भगत द्वारा चलाया गया “लरका आंदोलन” बहुत प्रसिद्ध आदिवासी आंदोलन है जिनका जिक्र इतिहास में नहीं मिल पाता है।


पूरे भारत में आदिवासियों ने अपने में क्षेत्र में जल जंगल जमीन का छीनने का प्रयास जब जब हुआ तब उन लोगों ने अपने हक अधिकार के लिए आंदोलन किए परंतु आज भी उन्हें अपने हक अधिकार के लिए वंचित रखा जा रहा है.

शेख भिखारी ने सन् 1857 ई. के संग्राम में उन्होंने अपनी वीरता, साहस, बुद्धि एवं राजनीति से अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिये थे. टिकैत उमराव सिंह के साथ मिलकर शेख़ भिखारी ने पिठोरिया तक अंग्रेज़ों को छकाया था. कहा जाता है कि शेख भिखारी की तलवार में इतनी ताकत थी कि अंग्रेज़ कमिश्नर मैकडोनाल्ड ने इसका ‘गजट’ में ज़िक्र किया था और उन्हें 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में खतरनाक बागी करार दिया था.शेख़ भिखारी ओरमांझी खुदिया के राजा टिकैत उमराव सिंह के दीवान और कुशल सेनापति भी थे.1858 ई. में अंग्रेज़ों ने छल-बल के साथ चुटूपालू के निकट भीषण लड़ाई के बाद शेख़ भिखारी को गिरफ्तार कर लिया और 7 जनवरी को उन पर मुकदमा चलाया गया.इस दौरान उनकी वीरता और साहस से भयभीत अंग्रेज़ों ने अदालती कारवाई पूरे किये बिना ही टिकैत उमराव सिंह के साथ शेख़ भिखारी को बरगद के पेड़ पर फाँसी दे दी.

झारखंड की महिला स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका भी उतना ही महत्वपूर्ण है, सरस्वती देवी, राजेश्वरी सरोज दास, शैलबाला राय, जाम्बवती देवी, प्रेमा देवी, उपा रानी मुखर्जी समेत झारखण्ड में एसे अनगिनत नाम हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी जान हथेली पर रखकर सम्पूर्ण महिला समाज को सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया. इनके बलिदान और संघर्ष की गाथा इतिहास के पन्नों को आज भी जीवंतता प्रदान कर रही है.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी कई बार रांची आए. इतिहासकार बताते हैं कि चंपारण सत्याग्रह की रणनीति रांची में ही बनी थी. कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन के दौरान गांधीजी ने जिस कार का इस्तेमाल किया था वो आज भी रांची में सुरक्षित है.

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