शबे बारात क्या है?
शब का अर्थ होता है “रात” और बारात का अर्थ होता है “बरी” होना , अर्थात “बरी होने की रात” या “माफी की रात”। इस्लामी कैलंडर के आठवें महीने की 15वीं रात को मुसलमान हर साल ‘शब-ए-बारात’ मनाते हैं।
अरब देशों में इसे “लैलतुल बराह” या “लैलतुन निसफे मीन शाबान” के नाम से जाना जाता है , यह मुसलमानों की वर्ष की 4 मुकद्दस रातों में से एक है जिसमें पहली “आशूरा की रात” दूसरी “शब-ए-मेराज”, “तीसरी शब-ए-बारात” और चौथी “शब-ए-कद्र” होती है।

मुसलमानों का यह विश्वास है कि इस रात को अल्लाह से माफी माँग कर वह अपने जिन्दगी में किए गुनाहों से बरी हो जाता है। मुसलमान इस सारी रात इबादत करके ख़ुदा से अपनी ग़लतियों और गुनाहों के लिए माफ़ी मांगते हैं। और कब्रिस्तान जाकर कब्रों और कब्रिस्तान की साफ सफाई करते हैं , मस्जिदों में रोशनी करते हैं , गरीबों को दान करते हैं और अपने से दूर हो चुके लोगों की कब्रों पर फातिहा पढ़कर उनकी मगफिरत के लिए अल्लाह से दुआ करते हैं।
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वहीं, दूसरी ओर मुसलमान औरतें घरों में नमाज पढ़कर, कुरान की तिलावत करके अल्लाह से दुआएं मांगती हैं और अपने गुनाहों से तौबा करती हैं। अगले दिन मुसलमान रोज़ा भी रखता है , यद्धपि यह फर्ज़ नहीं होता।
मुसलमानों के लिए यह मुबारक रात रमज़ान के महीने के 15 दिन पहले आती है और इसी रात के बाद मुसलमान रमज़ान कि तैय्यारियाँ शुरू कर देता है। अपनी कमाई और संपत्ती पर लगने वाले ज़कात की गणना करने लगता है।

मुस्लिम संगठनों नें घरों में रहकर इबादत करने की अपील
वर्तमान समय में कोरोना वायरस के वजह से पैदा हुई स्थितियों में पूरे देश में चल रहे लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंस को देखते हुए सभी मुस्लिम संगठन ने अपील की है कि शब-ए-बारात के अवसर पर अपने घरों में रहकर ही इबादत करें और लाकडाउन के संदर्भ में सरकार और प्रशासन की एडवाईज़री का पूरी तरह पालन करें और मस्जिद तथा कब्रिस्तान ना जाकर घर में ही इबादत करें और अपने गुनाहों के लिए अल्लाह से माफी माँगें।
दुवाएँ दूरी की मोहताज नहीं होतीं
दुवाएँ दूरी की मोहताज नहीं होतीं , यह जब ज़मीन से सात आसमान पार पहुँच सकती हैं तो कहीं से भी पहुँच सकती हैं। इस मुश्किल दौर में इस बार घर से ही दुआ करिए ।
सतर्क रहिए , खुद को नियंत्रित रखिए , लाकडाऊन का पुर्णतः पालन करिए ..

