झारखंड में प्लाज्मा थेरेपी से होगा कोरोना मरीजों का इलाज, CM सोरेन रिम्स में करेंगे उद्घाटन

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कोरोना संक्रमितों की संख्या झारखंड में तेजी से दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है. कोरोना के मामलो में इजाफा ही देखने को मिल रहा है. राज्य में कोरोना पॉजिटिव का आंकड़ा 7 हज़ार के पार कर चूका है. लेकिन थोडी राहत की बात यह है कि राज्य में एक्टिव केस की संख्या 3927 है जबकि 3254 मरीज ठीक हो चुके हैं.

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कोरोना संक्रमितों की संख्या को कम करने और मरीजों को जल्द स्वास्थ्य करने के लिए झारखंड सरकार रिम्स में प्लाज्मा थेरेपी की शुरुआत करने जा रही है. यानी झारखंड में प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना के मरीजों का इलाज किया जायेगा। सूबे के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने ट्वीट कर इसकी जानकारी देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रिम्स में इसका उद्घाटन करेंगे. आईसीएमआर के ट्रायल अनुमित पर कई राज्यों ने इस पद्धति से इलाज शुरू किया है जो सफल रहा है.

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क्या है प्लाज्मा थेरेपी जिससे हारेगा कोरोना वायरस:

कोरोना वायरस के मरीजों की जान बचाने के लिए प्लाज्मा थेरेपी वरदान साबित हो रही है. इस प्रक्रिया के जरिए उन लोगों के खून से बीमार लोगों का इलाज किया जाता है, जो इंफेक्शन से ठीक हो चुके होते हैं. यानि वो कोरोना योद्धा जो वायरस को हराकर ठीक हो चुके हैं. इसमें डॉक्टर खून के तत्वों से प्लाज्मा को अलग करते हैं, जिसमें एंटीबॉडीज शामिल होती हैं. इसको बीमारी से लड़ने वाले लोगों को दिया जाता है.

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एंटीबॉडी थेरेपी का उपयोग 20वीं शताब्दी की शुरुआत से ही बैक्टीरिया और वायरल दोनों संक्रमणों के इलाज या रोकथाम के लिए किया गया है. विभिन्न अध्ययनों के मुताबिक कोरोना के रोगियों के इलाज के लिए यह सुरक्षित तरीका है. इटली में, कॉन्वेसेंट प्लाज्मा के उपयोग से कोरोना से होने वाली मृत्युदर को रोकने में मदद मिली।

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एक तरफ टीका वायरस को रोकने या मारने के लिए किसी व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली को बेहतर करने का काम करता है. तो दूसरी तरफ प्लाज्मा थेरेपी में तैयार किए गए एंटीबॉडी का उपयोग होता है. प्लाज्मा थेरेपी से जुड़े कुछ जोखिम हैं. हालांकि, ये बेहद दुर्लभ हैं. उपचार के लिए लिया गया प्लाज्मा कुछ आवश्यकताओं को पूरा करता है. इसका परीक्षण होता है, इलाज किया जाता है.

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