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तिरूलडीह गोलीकांड से नायक बने थे शहीद निर्मल महतो, झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन शव से लिपट कर बहुत रोये थे

Shah Ahmad

झारखंड का इतिहास बड़ा ही लंबा और पेचीदा रहा है यूं तो झारखंड को खनिज संपदा और प्राकृतिक सौंदर्य के हिसाब से खूबसूरत माना जाता है लेकिन झारखंड के लिए लड़ने वाले लोगों के संघर्षों के कहानी भी काफी कुछ बताती है आज 25 दिसंबर है और झारखंड के शहीद निर्मल महतो का जन्मदिन भी है निर्मल महतो यदि आज होते तो उनकी उम्र 70 साल की होती परंतु वे अब इस दुनिया में नहीं है.

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21 अक्टूबर 1982 को झारखंड के इचागढ़ के तिरूलडीह में पुलिस के द्वारा छात्रों के प्रदर्शन पर गोली चलाई गई थी इस घटना में अजीत महतो और धनंजय महतो नामक छात्रों की मौत हो गई थी. पुलिस का आतंक इतना ज्यादा था की इस कार्रवाई के बाद गांव खाली हो गया था और मृतक के शवों को अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं था इस बात की जानकारी जब शहीद निर्मल महतो को मिली तो वे वहां पहुंचे और उनका अंतिम संस्कार किया था निर्मल महतो के द्वारा किए गए इस कार्य के बाद उनकी चर्चा तेजी से होने लगी.

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इसी चर्चा के बीच वर्तमान में झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष शिबू सोरेन को यह खबर मिली उस वक्त शहीद निर्मल महतो झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़ चुके थे गुरु जी ने निर्मल महतो की असली ताकत को उस वक्त समझ और जान चुके थे. गुरुजी निर्मल महतो से 6 वर्ष बड़े थे बावजूद इसके गुरुजी उन्हें निर्मल बाबू कह कर पुकारते थे उन्हें अपना छोटा भाई मानते थे दोनों के बीच एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव भी देखा जाता था साथ ही दोनों एक-दूसरे का सम्मान और बहुत भरोसा करते थे.

निर्मल महतो की अच्छाई और उनकी कार्यकुशलता से प्रभावित होकर गुरु जी ने यह तय कर लिया था कि निर्मल महतो को वह बड़ी जिम्मेदारी देंगे क्योंकि गुरुजी यह जानते थे कि अगर अलग झारखंड राज्य लेना है तो संगठन का पूरे झारखंड में विस्तार करना होगा साथ ही फायर ब्रांड वाले नेता और कार्यकर्ता को भी आगे लाने की जरूरत है और यह सभी गुण निर्मल महत्त्व में थे. जनवरी 1983 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के पहले महाअधिवेशन में शहीद निर्मल महतो को केंद्रीय कार्यकारिणी में लिया गया जिसके बाद यह कहा जाता है कि लगभग सवा साल ही बीते होंगे कि झामुमो के पास एक संकट आया तत्कालीन अध्यक्ष विनोद बिहारी महतो द्वारा एक संगठन बनाने के बाद ऐसे हालात पैदा हो गए थे कि झामुमो को नया अध्यक्ष चुनने की नौबत आ गई गुरु जी महासचिव थे चाहते तो खुद अध्यक्ष बन जाते परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया और भरोसा किया निर्मल महतो पर और उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौपी.

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6 अप्रैल 1984 को कार्यकारिणी सदस्य शहीद निर्मल महतो को गुरुजी शिबू सोरेन ने सीधे झारखंड मुक्ति मोर्चा का अध्यक्ष बना दिया जिसके बाद निर्मल महतो झामुमो के अध्यक्ष और शिबू सोरेन महासचिव थे कहा जाता है कि इस जोड़ी ने संगठन को बहुत सशक्त बना दिया लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा और गुरुजी के सामने संकट की स्थिति उस वक्त पैदा हो गई जब वर्ष 1987 में निर्मल महतो की जमशेदपुर में हत्या कर दी गई जिस वजह से झारखंड ने अपना एक नायक खो दिया था. यह भी बताया जाता है कि निर्मल महतो की हत्या होने के बाद झामुमो और गुरु जी के लिए यह बहुत बड़ी क्षति थी गुरु जी ने अपना एक विश्वासी साथी अपना भाई को दिया निर्मल महतो के शव से लिपट कर गुरुजी बहुत देर तक सोए थे ऐसे गहरे और आत्मीय संबंध दोनों के बीच बताये जाते थे.

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