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वन नेशन वन इलेक्शन से क्या है फायदा और नुकसान?

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New Delhi: 18 से 22 सितंबर तक विशेष सत्र बुलाए जाने पर एक आशंका जताई जा रही है कि लोकसभा चुनाव समय से पहले मोदी सरकार कर सकती है। इस सत्र से आशंका लगाया जा रहा था कि इस विशेष सत्र में यूनिफॉर्म सिविल कोड, महिला आरक्षण जैसे बिल पास करने को लेकर चर्चा होगी और कानून बनेगा परंतु बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने “एक नेशन एक चुनाव” कमेटी के अध्यक्ष पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी को बनाकर उसकी कॉपी सोप गई तब से राजनीतिक गलियारों में केवल एक ही चर्चा हो रही है कि इस विशेष सत्र में “एक नेशन एक चुनाव” पर बिल लाया जा सकता है। 18 से 22 सितंबर तक चलने वाले इस विशेष सत्र में पांच बैठकें होंगी। सूत्रों के मुताबिक, संसद के इस विशेष सत्र में मोदी सरकार ‘एक देश-एक चुनाव’ पर बिल लेकर आ सकती है। एक देश एक चुनाव का सीधा सा मतलब है कि देश में होने वाले सारे चुनाव एक साथ कराए जाएंगे।

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देश में ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ को लेकर बहस काफी समय से चल रही है। इसी साल जनवरी में लॉ कमीशन ने इसे लेकर राजनीतिक दलों से छह सवालों के जवाब मांगे थे. सरकार इसे लागू कराना चाहती है तो वहीं कई राजनीतिक दल इसके विरोध में हैं। संसद के विशेष सत्र के दौरान यूसीसी और महिला आरक्षण बिल भी पेश किए जा सकते हैं।

वन नेशन, वन इलेक्शन का विचार पहली बार साल 1983 के आसपास चुनाव आयोग द्वारा ही दिया गया। आजादी के बाद जब देश में पहली बार 1951-52 में लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं को चुनाव एकसाथ ही हुआ था।1957, 1962 और 1967 में भी ऐसा ही हुआ लेकिन इसके बाद कुछ विधानसभाओं के समय से पहले भंग हो जाने की वजह से यह साइकिल टूट गई और साल 1968 और 1969 में यहां चुनाव करवाए गए। 1970 में लोकसभा ही समय से पहले भंग कर दी गई। इसके बाद धीरे-धीरे चुनाव की साइकिल ही बिगड़ गई और अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनाव करवाए जाने लगे।

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संसदीय कार्यमंत्री प्रल्हाद जोशी ने ट्वीट किया कि संसद का विशेष सत्र (17वीं लोकसभा का 13वां सत्र और राज्यसभा का 261वां सत्र) 18 से 22 सितंबर के दौरान होगा, जिसमें 5 बैठकें होंगी. इस विशेष सत्र काल में संसद की कार्यवाही बेहद हॉट-टॉक होने की संभावना जताई जा रही है

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