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Sobran Manjhi: शहीद सोबरन मांझी महाजनी प्रथा और सामंतवाद के धुर विरोधी

zabazshoaib

झारखंड का परिचय और इतिहास के कोख में कई आंदोलनकारी जन्मे हैं। ऐसे ही एक महानायक आंदोलनकारी का नाम सोबरन मांझी(Sobran Manjhi

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) है जो आदिवासी समाज के शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ाई लड़े। बताते चलें कि आदिवासी समाज के शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ अनगिनत लोगों ने संघर्ष किया है और अपनी शहादत दी। कुछ को लोग जानते हैं। कुछ को कम जानते हैं और कुछ गुमनामी के अंधेरे में खो गए।

Sobran Manjhi: शहीद सोबरन मांझी महाजनी प्रथा और सामंतवाद के धुर विरोधी 1
शहीद सोबरन मांझी

बता दें कि एक नायक के रूप में सोबरन मांझी(Sobran Manjhi) ने उत्तरी छोटानागपुर क्षेत्र में महाजनी शोषण के खिलाफ जंग की आगाज ने की थी। जिसे आगे चलकर उनके बेटे राज्यसभा सांसद शिबू सोरेन ने मुकाम तक पहुंचाया। सोबरन मांझी (Sobran Manjhi) का जन्म कब हुआ इसकी सटीक तारीख बताना मुश्किल है लेकिन उनकी जघन्य हत्या महाजनों ने करवाई थी ऐसा “समर शेष है” के लेख से मालूम चलता है। गोला प्रखंड के नेमरा गांव की करीब हेडबरगा गांव के सामने आकाश को छूते हुए चंडू पहाड़ के तराई में बने एक चबूतरे पर दर्ज ये शब्द “झारखंड क्रांति स्थल” 27 नवंबर 1957 है” इसी तिथि को शहीद दिवस के रूप में सभी आदिवासी मनाते हैं।

सोबरन मांझी(Sobran Manjhi) गोला प्रखंड के नेमौरा गांव के रहने वाले थे। अपने गांव के गिने-चुने पढ़े-लिखे युवाओं में से एक और पेशे से शिक्षक, जिनकी राजनीति में भी थोड़ी बहुत दखल थी। शांत, सरल स्वभाव लेकिन किसी तरह का अन्याय ना सहने वाले थे। महाजनों-सामंतों से उनकी नहीं पड़ती थी उस दौर में शोषण का एक आम तरीका यह था कि महाजन जरूरत पड़ने पर शोध पर धान देते और फसल कटने पर बेवड़ा(डेढ़ गुना) वसूलते। ना चुकाने पर तरह-तरह के तरीकों से खेत अपने नाम करवा लेते। अंततोगत्वा भूमिहीन आदिवासी उसी के पास बेगार काम करके गुजारा करते। महाजनों ने ही महुआ का शराब का प्रचलन किया। ताकि वे नशाखोरी में लिप्त रहे, आदिवासी समाज की तबाही का माध्यम बन गया।

बता दे कि सोबरन (Sobran Manjhi) आदिवासियों को समझाते, उनमें नशाखोरी खत्म करने का जतन करते। एक बार की बात है कि सोबरन मांझी ने एक महाजन को सरेआम पीट भी दिया था। उनके नेतृत्व से आदिवासियों में बदलाव आना शुरू हो गया जिस कारण उन्हें घात लगाकर के प्रातः कालीन के वक्त जंगलों में मार दिया गया। उन दिनों सांसद शिबू सोरेन गोला के एक विद्यालय में पढ़ते थे और वहीं हॉस्टल में अपने भाई राजाराम के साथ रहते थे। लोग कहते हैं की शिबू सोरेन के लिए ही सोबरन मांझी चावल, चूड़ा आदि पहुंचाने जा रहे थे। उसी अहले सुबह को उनकी हत्या हुई थी।

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सोबरन मांझी ( Sobran Manjhi) की पत्नी सोनामणि स्वभाव के धैर्य और हिम्मत से लड़ने वाली महिला थी। उन्होंने बहुत दिनों तक अपराधियों को सजा दिलाने के लिए कोर्ट के चक्कर काटती रही। पर इसका कोई खास फायदा उन्हें समझ में नहीं आ रहा था तभी उन्होंने एक ऐलान के साथ कहा कि अपने पिता के हत्यारों के साथ उनके बच्चे ही इंसाफ करेंगे। और यह उद्घोषणा इस रूप में सच हुई कि बड़े होकर शिबू सोरेन ने महाजनी शोषण के खिलाफ वह ऐतिहासिक लड़ाई लड़े। जिसे हम “धनकटनी आंदोलन” के रूप में जानते हैं। उस आंदोलन में बाद में विनोद बिहारी महतो और कामरेड एके राय भी शामिल हुए और महाजनी शोषण के साथ-साथ कोयलांचल में माफियागिरी के खिलाफ भी निर्णायक लड़ाई लड़े। उसी संघर्ष के कोख में झारखंड मुक्ति मोर्चा का जन्म हुआ जो अलग झारखंड राज्य के संघर्ष का वाहक बना।

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